और फिर एक दिन …प्रार्थनाएँ सब कुछ बदल देती है- अमृत बिसारिया दुबई

सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से छनकर कमरे में आ रही थी। बारिश की महक अभी भी हवा में घुली हुई थी। आर्या खामोशी से मंदिर के सामने बैठी थी, दीया जल रहा था, पर उसके भीतर जैसे अंधेरा पसरा था।
“हे भगवान,” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “अगर कहीं कोई रास्ता हो, तो मुझे दिखा दीजिए।”
तभी पीछे से अरुण की आवाज़ आई, “फिर वही आँसू, आर्या? कितनी बार कहा है—सब ठीक हो जाएगा।”
आर्या ने बिना उसकी ओर देखे कहा, “कब, अरुण? महीनों से नौकरी की तलाश कर रहे हो। घर के खर्च, माँ की दवा यह सब कैसे चलेगा?”
अरुण कुछ पल चुप रहा। उसके कदमों की हल्की थाप कमरे में गूँज रही थी।
“मैं कोशिश तो कर रहा हूँ,” उसने थके हुए स्वर में कहा।
आर्या उसकी ओर मुड़ी—“कोशिश मैं भी कर रही हूँ कि न सोचूँ,?लेकिन डर, वो तो कम नहीं होता।”
कमरे में एक लंबी खामोशी फैल जाती है।बाहर से मंदिर की घंटी की आवाज़ आई, मानो किसी अनदेखे शुभ संकेत की तरह।
अचानक आर्या बोली, “अरुण, चलो आज मंदिर चलते हैं, बस पाँच मिनट। शायद, कोई जवाब मिल जाए।”
अरुण मुस्कुराया—“ठीक है, अगर तुम्हें सुकून मिलता है तो।”
दोनों मंदिर पहुँचे। धूप की खुशबू, मंत्रों की ध्वनि और ढलते सूरज की सुनहरी किरणें मिलकर एक अद्भुत सा दृश्य बना रही थीं। आर्या folded hands कर खड़ी रही, आँखें बंद- और बस एक वाक्य उसके मन में गूँज रहा था—
“प्रार्थनाएँ कभी व्यर्थ नहीं जातीं।”
वह लौट ही रहे थे कि अरुण का फोन बजा। स्क्रीन पर लिखा था—“Selected – Please join tomorrow.”
अरुण की साँसें जैसे थम गईं। “आर्या… ये देखो!”
आर्या ने काँपते हाथों से फोन पकड़ा—“ये, सच है?”
अरुण की आँखें भर आईं—“हाँ! मुझे नौकरी मिल गई!”
आर्या की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार डर के नहीं… राहत और विश्वास के।
“देखा, अरुण,” उसने धीमे से कहा, “कभी-कभी हम हार मान लेते हैं, पर ऊपरवाला नहीं।”
अरुण ने उसका हाथ थाम लिया—“और फिर एक दिन… सच में प्रार्थनाएँ सब कुछ बदल देती हैं।”
मंदिर की घंटी फिर बजी—मानो आसमान ने भी उनकी बात स्वीकार कर ली हो।
सचमुच पवित्र मन से की गई पार्थना सदैव फलीभूत होती है।
अमृत बिसारिया
दुबई




