आज की नारी — प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

आज की नारी केवल परंपराओं की परिधि में सिमटी हुई एक छवि नहीं, बल्कि वह बदलते हुए युग की सबसे प्रखर आवाज़ है। उसने सिद्ध कर दिया है कि कोमलता और कमजोरी दो अलग-अलग बातें हैं। आज वह अपने अस्तित्व की पहचान स्वयं गढ़ रही है।
वह एक हाथ से यदि घर की जिम्मेदारियों को कुशलता से सँभालती है, तो दूसरे हाथ से अंतरिक्ष की ऊँचाइयों को छूने का संकल्प भी रखती है। शिक्षा, विज्ञान, रक्षा और प्रशासन—ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा जहाँ उसने अपनी मेधा और परिश्रम का परचम न लहराया हो। वह अब केवल ‘सहयोगिनी’ नहीं, बल्कि एक ‘निर्णायक’ की भूमिका में है।
आज की नारी की सबसे बड़ी शक्ति उसका आत्मविश्वास और उसकी तार्किकता है। वह अपने अधिकारों के प्रति सजग है और रूढ़ियों की उन बेड़ियों को तोड़ने का साहस रखती है जो उसकी प्रगति में बाधक हैं। वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहकर भी आधुनिकता के साथ तालमेल बिठाना जानती है।
वह त्याग की प्रतिमूर्ति तो है, पर अब वह अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता करना नहीं जानती। वह एक माँ, बेटी और पत्नी के रूपों को निभाते हुए भी अपनी व्यक्तिगत पहचान को जीवित रखती है। वास्तव में, आज की नारी उस अखंड ज्योति के समान है, जो अपनी आत्मनिर्भरता से समाज के भविष्य को आलोकित कर रही है।
प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”




