एक स्त्री के प्रश्न — डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ बैतूल, मध्यप्रदेश

एक बात पूछना है तुमसे-
क्या तुम मुझे जानते हो,
एक पुरूष से विलग,
एक स्त्री का एकांत,
एक स्त्री का अकेलापन,
उसका सुनापन,
उसकी पीड़ा, कसक, तड़प ?
घर, प्रेम और जाति की,
परिभाषा से विलग,
उसके अस्तित्व को ?
उसकी अपनी जमीन,
उसके अंदर चल रहे अहसास को,
क्या बतला सकते हो तुम ?
दिखा सकते हो कई जन्मों,
सदियों से उठ रहे झंझावतों को,
अपने घर को तलाशती,
ठिकाना ढूंढती…
उस स्त्री को,
उसके घर का
पता बतला सकते हो ?
क्या उसकी कल्पनाओं में,
उड़ान भरते उसके,
अस्तित्व के मायने को ?
स्वयं को तराशती
अपने स्वातंत्र्य को ढूंढती…
एक पल में,
न जाने कब उसे स्थापित
कर दिया गया हो और
न जाने कब निर्वासित..
ख्बाबों में दौड़ लगाती,
उस स्त्री का पीछा,
कभी किया है तुमने ?
क्या कभी उसे रिश्तों,
घर की मर्यादा से विमुख,
उस कुरुक्षेत्र में,
खुद से लड़ते देखा है तुमने ?
अपने शरीर के ढांचे से परे,
उस स्त्री के मन की अंदर
पड़ी गांठों को खोलकर
पढ़ने का प्रयास किया है तुमने ?
उसके अंदर उबलते, उमड़ते
अभिलेखों, इतिवृत, पूर्ववृत्त को–
कभी समझने का प्रयत्न किया है तुमने ?
उसके अंदर उठ रहे ज्वार-भाटे को,
जिसे उसने अपने चेहरे की,
दहलीज पर शब्दों की राह तकते,
चरमराते रख रखा है–
उसके अंदर घर बना बैठी,
उन बातों को,
कभी अनुभूत किया है तुमने ?
जो उसके ह्रदय के अंदर,
कैक्टस जैसे फैले हुए है,
देखा है तुमने ?
उस स्त्री के सारे रिश्तों के समीकरण ?
क्या, उसकी स्वयं की दृष्टि में,
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा को पढ़ा है तुमने ?
अगर ये सब नही देखा और पढ़ा है,
तो तुम समझते क्या हो उसे–
घर की चौखट के,
अंदर रसोई और बिछावन के,
गणित से अलग,
उसका कोई अस्तित्व ही नहीं रहे–
बस सिर्फ इतना ही,
समझते हो तुम,
मुझे या मेरे,
स्त्रीत्व से अलग कुछ है,
या नही—
डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
बैतूल, मध्यप्रदेश



