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आलेख:हाय रे गर्मी जान लेती गर्मी — श्री पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर- गुजरात)

 

ग्रीष्म ऋतु आते की गर्मी जोर पड़ने लगती है।सूर्य अपने प्रचंडता के साथ आकाश में तपता रहता है। धरती झूलसने लगती है।सुबह की हल्की धूप कब तेज लपटों में बदल जाती है इसका हमे एहसास ही नहीं होता है।दोपहर तक तो स्थिति ऐसी हो जाती है कि घर से बाहर निकलने का मन ही नहीं करता। सूरज की किरणें अंगारा बरसाते है।भीषण गर्मी से चहुओर हाहाकार मच जाता है।मानव पशु पक्षी सभी लाचार हो जाते हैं।दूध देने वाले जानवर भी मर जाते हैं।सब अपने अपने घर में छुप जाते हैं।पशु पक्षी भी बाहर नहीं निकलते हैं।गांव की सारी गली सडके में सुनकर हो जाता है।खेत खलियान ने धूप की जैसे चादर ओढी हो ऐसा लगता है।सबका जीना बेहाल हो जाता है।तालाब नदिया सुख जाती है।गर्मी का प्रभाव केवल वातावरण तक सीमित नहीं रहता हमारे दैनिक जीवन को भी प्रभावित करता है।गर्मी तेज धूप और लू के कारण लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है।खेतों में काम करने वाले किसान लोग मजदूर लोग पसीने से तरबतर हो जाते हैं।वास्तव में अति अत्यंत कठिन और साहसपूर्ण कार्यों वो करते हैं। गर्मी अब मौसम नहीं आपदा है मुश्किल है।शहरों में भी गर्मी कष्टदायक हो जाती है। हमारी डीस्ट्रीक सुरेंद्रनगर में तो गर्मी का पार 44 -45 डिग्री तक छु जाता है। सबसे ज्यादा गर्मी पड़ रही है।ऐसी गर्मी हमें कभी नहीं देखी है।बढ़ता प्रदूषण तापमान को और बढ़ा देते हैं। इतनी गर्मी की पंखें और कूलर भी काम नहीं करते हैं। गर्मी में कई लोगों की मौत हो जाती है।दिमाग काम करना बंद कर देता है।लाइट चली जाने पर स्थित और सहनीय हो जाती है। सड़के घर की दीवारें तपने के कारण रात में भी गर्मी रहती है।लोगों के मुख से निकल पड़ता है;’हाय रे गर्मी जान लेती गर्मी।’
ऐसी गर्मी से हमें खुद को सुरक्षित रखना चाहिए। हल्का और सूती कपड़ा पहनना।धूप में निकलना ही नहीं।यदि निकालना पड़े तो साथ में सिर पर टोपी छाता लेकर निकलना साथ में नींबू शरबत रखना।
पेड़ पौधे केवल वातावरण को ठंडा नहीं रखते हैं बल्कि जीवन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।हमें पर्यावरण का संरक्षण और संतुलन बनाए रखना चाहिए।हम सब संकल्प करें पेड़ को काटे नहीं बल्कि लगाएंगे।

श्री पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर- गुजरात)

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