मेहमान – सीमा शुक्ला चांद

ना देह हमारी ना सांसो की लड़ीयो की ही है हमें कोई पहचान
जाने फिर भी धरा पर क्यों फिरते हैं बनकर हम सभी धरा के मेजबान
सुनकर तूफानों का आगमन घर को लौटता है ये सारा आसमान
तूफानों का इंतजार करते रहते हैं इसलिए भी धरा के वृद्ध होते मेजबान
माना क्षत विक्षत कर जाते हैं ये बवंडर और असमय के तूफान
फिर भी अपनो के आगमन के लिए तूफानों का इंतजार करता है मेजबान
बिमारीयां दुर्घटनाओ का ही दूसरा नाम है ये आने जाने वाला तूफान
पर स्नेह अपनो का मिलेगा कुछ पल ही सोचता है हर भावनात्मक इंसान
मोह लगाव जुड़ाव भावनाएं सभी तो परखता है हर तूफान
आने जाने वाले मेहमान व्यस्त कृत्रिमता का रखते हर पल ध्यान
ना फ़िक्र है ना जिक्र है जिनके स्वर में वही दे देते हैं सावधानियो का ज्ञान
बैठकर इस ठौर लगा रहता है जिनका बस कहीं किसी और डगर ही ध्यान
शायद ये लोक लाज के आवरण हैं या है कोई मुद्दा जो देगा मान सम्मान
तभी तो संग रहकर कुछ पल हर मेजबान बन जाते हैं मेहमान
सीमा शुक्ला चांद




