संस्कार – नरसा राम जांगु (राजस्थान)

संस्कार बाजार में नहीं मिलते और विरासत में तो कतई नहीं, ये तो माँ की रोटी की महक और बापू की फटी धोती की सिलवटों में बसते हैं।
बात मेरे बचपन की है। हमारा घर मिट्टी का था, पर आंगन हमेशा लीपा-पुता रहता था। माँ अनपढ़ थी, उसने कभी किताब नहीं पढ़ी थी।
एक दिन मैं स्कूल से आया, बहुत भूख लगी थी। थाली में एक ही बाजरे की रोटी थी। मैंने झट से आधी तोड़ ली। तभी बाहर से रामू काका आ गए। माँ ने बिना कुछ कहे मेरी आधी रोटी में से भी आधी तोड़ कर काका की थाली में रख दी और बोली – “पहले मेहमान, फिर घर।”
उस दिन मैं भूखा रह गया, पर एक बात पेट भर कर सीख गया।
बापू के पास एक ही कुर्ता था, पर जब भी गाँव में कोई मर जाता, वो वही कुर्ता पहन कर सबसे पहले उसके घर पहुँच जाता। मैं पूछता, बापू नया क्यों नहीं सिलवाते? तो हँस कर कहते – “बेटा, कपड़े तन ढकते हैं, संस्कार मन। मन मैला हो तो रेशम भी बेकार है।”
आज मैं शहर में हूँ, अच्छी नौकरी है, सब कुछ है। पर जब भी कोई मेरे सामने झूठ बोल कर आगे निकलना चाहता है, तो मुझे माँ की वो आधी रोटी याद आ जाती है। जब भी मन करता है कि किसी को नीचा दिखा दूँ, तो बापू का वो फटा कुर्ता आँखों के सामने आ जाता है।
यही तो संस्कार है।
संस्कार कोई बड़ा उपदेश नहीं है। ये तो छोटी-छोटी बातें हैं –
बड़ों के सामने ऊँची आवाज में न बोलना,
अपने से छोटे को आप कह कर बुलाना,
और भूखे को देख कर अपना हिस्सा बाँट देना।
ये डिग्रियाँ नहीं सिखातीं, ये तो घर की चौखट सिखाती है।
नोट: यह संस्मरण लेखक की कल्पना है, जिसका उद्देश्य संस्कारों का महत्व बताना है।
लेखक – नरसा राम जांगु (राजस्थान)




