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स्वराज्य का अर्थ – कविता साव

 

स्वराज्य केवल इतना नहीं है कि किसी देश की शासन-व्यवस्था की बागडोर अपने हाथों में आ जाए। स्वराज्य का वास्तविक अर्थ इससे कहीं व्यापक और गहरा है। ‘स्व’ अर्थात अपना और ‘राज्य’ अर्थात शासन—अर्थात अपने जीवन, समाज और राष्ट्र के निर्णय स्वयं करने की स्वतंत्रता। परंतु यह स्वतंत्रता अधिकारों के साथ कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को भी स्वीकार करती है।

महात्मा गांधी के लिए स्वराज्य का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था, बल्कि आत्मशासन भी था। जिस व्यक्ति ने अपने विचारों, इच्छाओं और आचरण पर संयम स्थापित कर लिया, वही वास्तविक अर्थों में स्वराज्य की पहली सीढ़ी पर पहुँचता है। इसी प्रकार जिस समाज में नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग होने के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी ईमानदार हों, वहाँ स्वराज्य सार्थक होता है।

राजनीतिक दृष्टि से स्वराज्य का अर्थ है—जनता द्वारा चुनी गई ऐसी शासन-व्यवस्था, जो जनता के हित में कार्य करे। सामाजिक दृष्टि से यह समानता, न्याय और सम्मान की भावना है। आर्थिक दृष्टि से स्वराज्य आत्मनिर्भरता और अपने संसाधनों पर विवेकपूर्ण अधिकार का प्रतीक है। सांस्कृतिक दृष्टि से यह अपनी भाषा, परंपराओं, मूल्यों और विरासत के प्रति सम्मान तथा उन्हें समयानुकूल आगे बढ़ाने की चेतना है।

स्वराज्य हमें यह भी सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल माँगने की वस्तु नहीं, बल्कि निभाने का दायित्व है। यदि नागरिक अपने अधिकारों की बात तो करें, लेकिन कानून, प्रकृति, सार्वजनिक संपत्ति और दूसरे मनुष्यों के अधिकारों का सम्मान न करें, तो राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद स्वराज्य अधूरा रह जाता है।

आज स्वराज्य की आवश्यकता शासन से लेकर व्यक्ति के जीवन तक हर स्तर पर है। हमें दूसरों पर दोषारोपण करने के बजाय स्वयं से प्रश्न करना होगा—क्या हम अपने निर्णय विवेक से लेते हैं? क्या हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं? क्या हम राष्ट्रहित को निजी स्वार्थ से ऊपर रख सकते हैं?

अतः स्वराज्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, चेतना का परिवर्तन है; केवल शासन करने का अधिकार नहीं, स्वयं को अनुशासित करने का संकल्प है। जिस दिन व्यक्ति अपने भीतर स्वराज्य स्थापित कर लेगा, उसी दिन परिवार, समाज और राष्ट्र में भी सच्चे स्वराज्य की नींव मजबूत होगी।

स्वराज्य का अंतिम उद्देश्य यही है कि राष्ट्र स्वतंत्र होने के साथ-साथ जागरूक, आत्मनिर्भर, न्यायपूर्ण और उत्तरदायी बने। यही स्वराज्य की आत्मा है और यही स्वतंत्रता का वास्तविक सम्मान भी।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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