शिक्षक दिवस पर मेरे समस्त गुरुओं को कविता के माध्यम से वन्दन अभिनंदन – मैं सारे शिक्षक गण का, आभार जताने आई हूँ। डॉ – डिम्पल सैनी
शिक्षक दिवस पर मेरे समस्त गुरुओं को कविता के माध्यम से वन्दन अभिनंदन
एक गुरु की आवश्यकता पडती हमें निरंतर हैं ।
हमनें जो भी सीखा अपने गुरुओं से ही सीखा हैं ।
ज्ञान गुरु का अंधकार में जैसे सूर्य सरीखा हैं।
जनम लिया जब मैने खुद का माँ को प्रथम गुरु पाया ।
उठना – चलना ,खाना – पीना माँ ने ही तो सिखलाया ।
माँ की जगह पिता ने ली जैसे जैसे उम्र बढ़ी ।
घर , बाहर कैसे जीना है बात पिता ने सिखलाई।
फिर हम विद्यालय में आये अक्षर ज्ञान हुआ हमको।
भाषा और कई विषयों का ज्ञान प्रदान हुआ हमकों ।
गुरु ने हमको दी शिक्षा संयम और अनुशासन की।
गुण-अवगुण , सही-गलत और देशप्रेम और शासन की।
लेकिन हम सब शिक्षा पाकर भूल गुरु को जाते हैं।
केवल पाँच सितम्बर को ही, याद गुरु क्योँ आते हैं।
अपने सब गुरुओं को मैं, दिल से याद करने आई हूँ।
मैं सारे शिक्षक गण का, आभार जताने आई हूँ।
कदम कदम पर ठोकर खाते, शिक्षा अगर नहीं होती ।
खुद को रास्तों पर भटकाते, शिक्षा अगर नहीं होती
शिक्षा ये बेमानी होती, शिक्षक अगर नहीं होते।
बस केवल नादानी होती, शिक्षक अगर नहीं होते ।
आगे बढ़ने का पथ हमकों, शिक्षक ही दिखलाते हैं।
सही गलत का निर्णय करना, शिक्षक ही सिखलाते हैं।
शिक्षक क्या होते हैं सबको, आज मैं बतलाने आई हूँ।
मैं सारे शिक्षक गण का, आभार जताने आई हूँ।
अगर गुरु वशिष्ठ नही होते, तो शायद राम नहीं होते।
गुरु संदीपन शिक्षा नही देते, तो क्या घनश्याम मुरली मनोहर होते।
द्रोणाचार्य गुरु बिना कोई , अर्जुन कैसे बन पाता।
चंद्रगुप्त चाणक्य के बल पर, ही सुशासक बन पाया।
परमहंस के द्वारा विवेकानंद, सरीखा सा शिष्य मिला।
गोखले ने गांधी जैसा, उज्ववल एक भविष्य दिया ।
सावित्री बाई फुले शिक्षिका के हाथों, महिलाओं का उत्थान हुआ।
ज्योतिबा राव फुले जैसा शिक्षक पाकर, शिक्षक सारे धन्य हुए।
अंबेडकर या इंदिरा गाँधी ,ध्यानचंद या हो तेंदुलकर ।
भीमसेन जोशी के सुर हो ,या हो बिस्मिल्लाह की शहनाई।
गुरुओं की शिक्षा ने ही तो, इनको शोहरत दिलवाई।
शुक्राचार्य ,बृहस्पति हैं ये , मैं इन्हें मनाने आई हूँ।
माँ – पिता और समस्त गुरुजनों का, मैं दिल से वन्दन करने आई हूँ।
मैं सारे शिक्षक गण का, आभार जताने आई हूँ।
डॉ – डिम्पल सैनी




