संस्मरण: कुछ दर्द कहे नहीं जाते – पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेन्द्रनगर- गुजरात)

कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में बांधना संभव नहीं होता। वो मन की गहराइयों में चुपचाप उतर जाते हैं और फिर जीवनभर एक मौन स्मृति की तरह हमारे साथ चलते रहते हैं।उनकी अंतर्वेदना आजीवन रहती है हमारा एक दर्द मेरे अंतर्मन में भी है।आज भी मुझे उसका संस्मरण होता है।
जब मैं पढ़ता था तब की यह बात है।एक बार लग्न में मेरी बहन के साथ उसके परिवार की एक लड़की आई। ये लड़की का नाम मीना था।पहली ही नजर में मुझे यह पसंद आ गई। हम साथ साथ लग्न में गए। तीन चार दिन हमने साथ में बिताए। इसके चेहरे की मुस्कान,मेरे साथ बात करने का तरीका और उसकी आंखों में जब मैं देखता था तब प्रेम उभरता था।मुझे ऐसा लगता था कि वो भी मुझे पसंद करने लगी थी। लग्न के बाद मीना भी अपने गांव चली गई। मैं भी पढ़ने के लिए शहर में चला गया। यहां पिताजी ने मेरी मंगनी मुझे पूछा भी नहीं और रेखा के साथ तय कर दी।घर आया तो पता चला। मुझे मीना पसंद है यह बात भी किसी को भी कह नहीं सकता था। इसका जिक्र भी मैंने कभी नहीं किया था।यह मेरी गलती थी। मैंने सोचा अब किसी से कहने का क्या फायदा। शायद प्रेम की सबसे बड़ी हार बिछड़ना नहीं होती सबसे बड़ा दर्द तब होता है जब किसी की ज़िंदगी में आपकी ज़रूरत ही ख़त्म हो जाती हैऔर आपकी पूरी दुनियाअब भी उसी के इर्द गिर्द घूम रही होती हैं।जो दर्द हमे सहन करना है वो हमें ही करना है। कुछ अपने दर्द किसी से कहा नहीं जाता। उन्हें महसूस किए जाते हैं। जिसमें हम असमंजस में होते हैं कि यह बात किसी को बतायें जायें या नहीं। दुःख दर्द या तकलीफ बांट लेने से दुःख आधा हो जाता है। लेकिन हमें यह जानना चाहिए कि उसे ये कहे या ना कहे। अनकही बातें कभी दिल का बोझ बन जाती है। सच तो यही है कि मेरी यह तकलीफ किसी को बताने का कोई फायदा नहीं था। मैंने
रेखा के साथ शादी भी कर ली।आज बरसों बीत गए। मैं खुश हूं। कभी कभी ये संस्मरण हो जाता है।
“उसे भूलना ही उचित गया वक़्त जो बीत,
वर्तमान में खुश रहो कहे प्रेम मीत।”
पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेन्द्रनगर- गुजरात)




