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आधुनिक शिक्षित नारी- फिर भी दहेज प्रथा का शोषण क्यों – पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर-गुजरात)

 

आधुनिक युग में समाज में दहेज प्रथा एक कलंक है। यह एक ऐसा राक्षस है। बेटी के रूप में सशक्त नारी बहू के रूप में असहाय होकर दहेज प्रथा में हार जाती है। इस कुप्रथा के कारण कमजोर पड कर दहेज की बली चढ़ाती जाती है।
नारी पढ़ लिखकर हरेक क्षेत्र में उसने सफलता पाई है। पहले पुरुषों पर आधारित थी। आज अपने पैरों पर खड़ी हुई है। आत्मनिर्भर भी बनी है। वह परिवार समाज और राष्ट्र निर्माण में पुरुषों के समान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। फिर भी आधुनिक शिक्षित नारी दहेज कुप्रथा का भोग बन रही है। यह प्रथा नारी के सम्मान और अस्तित्व को चोट पहुंचा रही है। विवाह के समय उसके संस्कार प्रतिभा और व्यक्तित्व को नहीं अधिक महत्व दहेज को दिया जाता है। रुपए गाड़ी की मांग की जाती है। समाज की मानसिकता अभी बदली नहीं है। शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं बल्कि विचारों में परिवर्तन लाना है। अच्छे इंसान की सबसे पहली और सबसे आखिरी निशानी ये है कि वो उन लोगो की भी इज्जत करता है
जिनसे उसे किसी किस्मत के फायदे की उम्मीदे नही होती।ज़िन्दगी के इस सफर में हम सब एक मुसाफिर हैं अहंकार न करें प्रेम से रहें
मृदुल व्यवहार उपहार है। दहेज प्रथा से अनेक परिवारों को आर्थिक पीड़ा भूगतनी पड़ती है। कई बिटिया विवाह के बाद भी सहती है। युवा वर्ग को खुद ही आगे आना होगा। नारी सम्मान का प्रतीक है। कोई वस्तु नहीं है।माता-पिता को भी लड़का लड़कियों में भेदभाव नहीं रखना चाहिए। माता-पिता आज भी लड़कियों को को पूरी आजादी नहीं दे रही है। सांस को भी सोचना होगा पहले वो भी बहु थी किसी की बेटी थी यह भावना सुदृढ़ होगी तो इसको प्रथा में सुधार हो सकता हैं। तभी समझ में सुदृढ़ परिवार विकसित
होगा।
“समृद्धि युत परिवार ही श्रेष्ठ राष्ट्र आधार,
प्रश्न सामने है खड़ा
मिल कर करें विचार।

पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर-गुजरात)

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