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आराधना में गरबा नृत्य का बदलता रूप कितना उचित…अनुचित — अलका गर्ग

 

सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएँ,
आधुनिक युग में गरबा नृत्य का बदलता रूप पारम्परिक रूप से त्यौहार मनाने वालों को तो बिल्कुल भी मान्य नही है।आज तो शालीनता पूर्ण सुंदर मनमोहक गरबा का रूप ही कहीं खो गया।
हारमोनियम ढोल की मधुर थाप पर गाया जाने वाले मैया के मधुर भजन ,अधेड़ और बुजुर्ग महिलाओं की सीधे पल्ले को क़रीने से सम्हाल कर पहनी हुई बॉर्डर वाली साड़ी , किशोरियों के रंग बिरंगे चमकदार लहँगे चोली,पुरुषों का मनभावन परिधान पहन कर हौले हौले बहुत सुंदर भाव भंगिमाओं के साथ गोल घेरे में गरबा करना हमारी संस्कृति का सुंदर पावन रूप था।हर बार घूमने पर चमकती साड़ियों का सुंदर बॉर्डर , लहराती लम्बी गजरा गुँथी चोटियाँ और परिधानों की लम्बी डोरियाँ बिजली की सुंदर रोशनी में अलग ही समाँ बाँधती थीं।न चाहते हुए भी देखने वालों के भी पैर थिरकने लगते थे ।
सभी अम्बे मात को रिझाने के लिए बहुत मोहक मुद्रायें बना कर बीच बीच में उनको निहारते हुए भक्तिभाव से नाचते थे।न कोई होड़ ,न प्रतियोगिता ,न DJ का कानफोड़ू संगीत, न दिखावा, न ड्रेस कोड ,न पावर गरबा ,पंजाबी धुन पर गरबा ,जिमनास्टिक गरबा और भी ना जाने क्या क्या ….ये सब कुछ भी नही होता था ।आज यह सब देख कर बहुत कोफ़्त होती है
एक बार अहमदाबाद में देखने का मौक़ा मिला तो तीन घंटे के प्रोग्राम में मैं अपना पारम्परिक गरबा को तो ढूँढती ही रह गई । इतने मशहूर ग्रूप का गरबा देखने गई थी बहुत मायूस हो कर लौटी। गरबा को भी सुंदर विभिन्न रूपों में करने का रिवाज़ है जो बहुत अभ्यास के बाद कुछ ही लोग कर पाते हैं जैसे सर पर मटकियाँ रख कर बरतन में आग जला कर रख कर बहुत तेज़ी से घूमते हुए गरबा करना पर ये सब कला खोती जा रही हैं और फूहड़ नई चीजें जुड़ रही हैं। अंग प्रदर्शन की तो होड़ लगी रहती है मानो उसी के लिए कोई ईनाम मिलने वाला हो।
बड़े शहरों में इवेंट मनेजमेंट के द्वारा पंडाल बना कर बड़े आयोजन किए जा रहे हैं जहाँ pub की तरह आप अपने पार्टनर के साथ ही अंदर जा सकते हैं या अंदर जा कर अपना पार्ट्नर चुन ने के लिए कहा जाता है खुलेआम बेशर्मी हद पार कर रही है। गरबा तो सास बहु ,ननद भाभी , भाई भाई, दो सहेली कोई भी एक साथ कर सकता है फिर इसे सिर्फ़ पुरुष महिला के जोड़े में क्यूँ पहचान दी जा रही है ?
नई पीढ़ी इसी रूप को सही मान कर सिर्फ़ मौज मस्ती शोर शराबे ,
फूहड़पन से उछलने को ही असल गरबा समझ रही है जो कि बिल्कुल सही नही है इससे हमारी एक
ख़ूबसूरत परम्परा का अंत हो जाएगा।बच्चों को समझाना होगा इस बदलते रूप को रोक कर उन्हें गरबा के असली रूप से परिचित कराना होगा। माँ की मंगल आरती के समय भी DJ का बंद न होना वाक़ई असहनीय होता है। घंटी घंटे शंख की मधुर ध्वनि से आरती में जो भक्ति भाव जागता है वो अवर्णनिय है ।
कुल मिला कर गरबा का ये आधुनिक रूप बिल्कुल भी सराहनीय और सहनीय नहीं है।

अलका गर्ग, गुरुग्राम

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