स्कूल की यादगार सजा– डॉ संजीदा खानम शाहीन

बात उस वक्त की है जब मुझे स्कूल मे जन्माष्टमी पर एक नाटक मंचन करना था में कक्षा 4 में पढ़ती थी ।
में बहुत सुंदर नटखट बालिका थी कक्षा में मॉनिटर की भूमिका में रहती थी सभी टीचर का बहुत स्नेह रहता था क्योंकि में इंटेलिजेंट थी ।
पढ़ने में अच्छे मार्क्स आते थे।सभी प्रभावित थे मुझ से एक दिन जब उत्सव के दौरान हमारी कक्षा में एक नई मैडम आई नाम था ।
राजपाल मेम गुस्से की तेज मोटी और नाटी सी थी ।हमने बहुत स्वागत किया मेम का वो बहुत अच्छी हिंदी पढाती थी।मुझे जन्माष्टमी पर्व पर किसना का रोल करना था ।
राजपाल मेम बोली मेरा नाटक देखने से पहले की में ये रोल न कर सकती बिना देखे भला कोई ऐसे करता मेम ने दूसरी लड़की को ले लिया ।जब वक्त आया नाटक मंचन का जिस लड़की की मेम ने लिया वो नहीं आई उस दिन स्कूल तो मेम को मुझे ही लेना पड़ा और जब मैने नाटक किया तो मुझे जज ने जो बाहर से आए थे प्रथम स्थान दिया , मेम बोली अरे वाह में तो गलत सोच रही थी कि तुम नही कर सकती।तुमने तो बहुत अच्छा रोल किया ।कहते सच्ची मेहनत कहां से किया गया काम सफल होता मालिक खुद मदद करता है ।
ये बात मुझे जब रोल से हटाया गया तो किसी सजा से कम न लगा था न था ,लेकिन मालिक ने मेरी सुनी और मैने रोल किया और ईनाम भी हासिल किया ।सभी स्कूल वाली ने मुझ पर गर्व किया,और बधाई शुभकामनाएं
आशीर्वाद दिया ।
मौलिक ,स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन




