अब वो बात नहीं – एक होली संस्मरण — कविता साव पश्चिम बंगाल

माँ के हाथ का मालपुआ… और गुजियों की वह मीठी-सी खुशबू, आज भी मन की देहरी पर आकर ठिठक जाती है। रसोई से उठती घी और इलायची की महक जैसे पूरे घर को उत्सव बना देती थी। हम सब बार-बार रसोई में झाँकते, और माँ मुस्कराकर कहतीं — “अभी नहीं, पहले पूजा, फिर मिठाई।”
आँगन में पिताजी पहले से रंग और गुलाल सजा कर रखते। उनका नियम था — “होली प्रेम से खेली जाती है।” वे सबसे पहले हमारे माथे पर हल्का-सा गुलाल लगाते और आशीर्वाद देते। उनके उस स्पर्श में अपनापन, सुरक्षा और संस्कार — तीनों एक साथ महसूस होते थे। फिर वे हँसते हुए कहते — “अब जाओ, मचा लो धूम!”
होली की सुबह जैसे शरारतों का खुला निमंत्रण होती थी। आते-जाते पथिक पर रंग डालकर भाग जाना, फिर कोने में छिपकर हँसी रोकना… और यदि पकड़े गए तो मासूम चेहरा बनाकर कहना —
“बुरा ना मानो, होली है!”
भाई-बहनों में रंग को लेकर तकरार भी कम न होती थी। कौन-सी पिचकारी मेरी, कौन-सा रंग तुम्हारा — इस बात पर मानो युद्ध छिड़ जाता। कोई रूठता, कोई चिढ़ाता, कोई शिकायत लेकर माँ के पास पहुँचता, और पिताजी मुस्कराकर समझाते — “रंग जितना बाँटोगे, उतना ही गाढ़ा होगा।”
तब लगता था यह झगड़ा है… पर आज समझ आता है — वही तो हमारा सबसे सच्चा प्यार था।
दोपहर तक जब सब थककर बैठते, चेहरों पर रंगों की परतें और आँखों में चमक होती। माँ थाली में मालपुए और गुजिए सजाकर बुलातीं, और पिताजी हँसते हुए कहते — “अब पहचानो, कौन किसका बेटा-बेटी है!” हम सब एक-दूसरे को देखकर फिर हँस पड़ते। उस हँसी में अपनापन था, बेफिक्री थी, और एक अटूट साथ था।
अब होली आती है, रंग भी आते हैं, मिठाइयाँ भी बनती हैं… पर न वो तकरार है, न पिताजी का वह स्नेहिल गुलाल, न माँ की वह डाँट में छिपी ममता। लगता है जैसे रंगों की चटकता कहीं फीकी पड़ गई हो।
आज समझ में आता है —
वो तकरार नहीं, हमारा प्रेम था।
वो शरारत नहीं, हमारी मासूमियत थी।
और पिताजी का वह पहला गुलाल — हमारे जीवन का सबसे सच्चा आशीर्वाद था।
सच ही तो है…
अब वो बात नहीं।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




