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जीवन साथी – परिपूर्णता नहीं, अपनत्व की परिभाषा — माया शर्मा

 

लेखिका: माया शर्मा

समाज में जब दो लोग जीवन साथी बनते हैं, तो अक्सर यह अपेक्षा की जाती है कि वे “परफेक्ट कपल” हों — रूप, शिक्षा, सामाजिक स्थिति और शारीरिक स्वस्थता के मानकों पर खरे उतरते हुए। ऐसे जोड़ों को देखकर समाज वाहवाही करता है, उनकी जोड़ी की मिसालें दी जाती हैं। लेकिन जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे जीवन साथी को चुनता है जो किसी शारीरिक अंग से विहीन हो या किसी विशेष आवश्यकता वाला हो, तो उसी समाज की नजरें सवालों और तानों से भर जाती हैं।

“उसने ऐसा जीवन साथी क्यों चुना?”
“क्या उसे किसी लालच ने ऐसा करने पर मजबूर किया?”
“जरूर उस इंसान में भी कोई कमी रही होगी।”

ऐसे सवाल और शंकाएं समाज में सहज रूप से उठती हैं, जो न केवल पीड़ित व्यक्ति का मनोबल तोड़ती हैं, बल्कि उस साहसी व्यक्ति की भावना और समर्पण को भी ठेस पहुँचाती हैं जिसने सच्चे प्रेम, अपनत्व और समझदारी से अपने जीवन साथी का चुनाव किया।

सच्चा जीवन साथी – सहानुभूति नहीं, समानुभूति
जो लोग किसी अंगविहीन या दिव्यांग व्यक्ति के साथ जीवन बिताने का निर्णय लेते हैं, वे सहानुभूति नहीं, बल्कि समानुभूति (Empathy) के आधार पर संबंध बनाते हैं। यह निर्णय कोई दया या लालच से उपजा हुआ नहीं होता, बल्कि यह एक गहरी समझ, परिपक्व सोच और मानवीय संवेदनशीलता की मिसाल होता है। ऐसा व्यक्ति न केवल समाज की ठोस सोच को चुनौती देता है, बल्कि प्रेम और मानवीय गरिमा की एक नई परिभाषा भी प्रस्तुत करता है।

समाज की मानसिकता – बदलाव की आवश्यकता
हमें स्वीकार करना होगा कि हमारा समाज अभी भी ‘परफेक्शन’ की झूठी परिभाषा से ग्रसित है। शारीरिक अक्षमता को अक्सर दुर्बलता या बोझ समझा जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बातें — जैसे प्रेम, विश्वास, समर्पण और समझ — किसी भी शारीरिक स्थिति से कहीं ऊपर होती हैं।

समाज को चाहिए कि वह ऐसे साहसी और भावनात्मक रूप से समृद्ध लोगों को सलाम करे, जो बिना किसी भेदभाव के अपने जीवन के साथी को अपनाते हैं और उसके साथ खड़े रहते हैं, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों। यही असली मानवता है, यही सच्चा प्रेम है।

उदाहरण बनने की जरूरत
हर वह व्यक्ति जो एक शारीरिक रूप से अक्षम साथी के साथ मिलकर एक संपूर्ण जीवन जीता है, एक जीता-जागता उदाहरण है कि प्रेम आत्मा से होता है, शरीर से नहीं। ऐसे संबंधों को प्रचारित किया जाना चाहिए, ताकि समाज के पुराने ढांचे टूटें और नया दृष्टिकोण जन्म ले सके।

निष्कर्ष
हमारे समाज को अब यह समझने की जरूरत है कि ‘जीवन साथी’ का मतलब केवल साथ चलना नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में साथ निभाना है। किसी दिव्यांग या शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति को जीवनसाथी चुनने वाला व्यक्ति न केवल साहसी होता है, बल्कि वह समाज को यह संदेश देता है कि मानवीय रिश्तों की नींव दिखावे पर नहीं, संवेदनाओं पर टिकती है।

ऐसे लोगों को सवालों की नहीं, सम्मान की जरूरत है। हमें उन्हें कोटि-कोटि नमन करना चाहिए — क्योंकि उन्होंने यह साबित कर दिया है कि सच्चे प्रेम में कोई सीमा नहीं होती।

“कमी शरीर में हो सकती है, सोच में नहीं।
दृष्टि खो सकती है, दृष्टिकोण नहीं।
सच्चा जीवन साथी वह है जो आत्मा को देखे, न कि सिर्फ शरीर को।”

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