राष्ट्रीय महिला दिवस — सुनीता तिवारी

कहानी
सुबह की धूप जब आँगन में उतरी, तो शांति ने अपनी बेटी रिया के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“आज स्कूल जल्दी जाना, आज विशेष कार्यक्रम है।”
रिया ने मुस्कुराकर पूछा, “माँ, आज ऐसा क्या है?”
शांति ने धीमे से कहा, “आज राष्ट्रीय महिला दिवस है।”
रिया के लिए यह बस एक तारीख थी, पर शांति के लिए पूरा जीवन।
कभी वह खुद पढ़ना चाहती थी, पर हालातों ने किताबों की जगह जिम्मेदारियाँ थमा दीं।
उसने अपने सपनों को चुपचाप रसोई के कोने में रख दिया, ताकि बेटी के सपने खुले आसमान में उड़ सकें।
स्कूल में मंच से जब शिक्षिका बोलीं
“महिला केवल सहनशील नहीं, सृजनशील भी है,”
तो रिया की आँखों में अपनी माँ का चेहरा उभर आया।
वह समझ गई कि माँ की चुप्पी कमजोरी नहीं, त्याग की भाषा थी।
शाम को घर लौटकर रिया ने अपना बनाया एक छोटा- सा कार्ड माँ को दिया
उस पर लिखा था
“मेरी पहली नायिका मेरी माँ।”
शांति की आँखें भर आईं।
उस दिन उसे लगा कि उसका अधूरा सपना, बेटी की उड़ान में पूरा हो गया है।
राष्ट्रीय महिला दिवस केवल मंच और भाषणों का दिन नहीं था,
वह हर उस स्त्री की कहानी थी
जो खुद पीछे रहकर
दूसरों के लिए आगे का रास्ता बनाती है।
सुनीता तिवारी




