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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर•••समय निकालकर अवश्य पढ़े • प्रार्थना राय की कलम से

 

​कल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। यह उत्सव है उस शक्ति का जिसे हम ‘स्त्री’ कहते हैं। आज मैं उन उपलब्धियों का गौरव गान करने जिन्होंने इतिहास बदला है, और उन चुनौतियों पर प्रहार करने जो आज भी हमारी राह का रोड़ा बनी हुई हैं।

​हमारा इतिहास साक्षी है कि भारतीय नारी कभी अबला नहीं रही। जब दुनिया सभ्यता की परिभाषा सीख रही थी, तब गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियां शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े विद्वानों को निरुत्तर कर रही थीं। हमारी मिट्टी गवाह है उस अदम्य साहस की, जो महारानी लक्ष्मीबाई और झलकारी देवी ने दिखाया। उन्होंने रणभूमि में साबित किया कि चूड़ियाँ पहनने वाले हाथ जब तलवार थामते हैं, तो बड़े-बड़े साम्राज्यों की चूलें हिल जाती हैं। अहिल्याबाई होल्कर का कुशल शासन आज भी सुशासन की मिसाल है, तो वहीं उदा देवी पासी जैसी वीरांगनाओं ने अपनी मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति देकर यह स्पष्ट कर दिया कि स्वाधीनता की वेदी पर स्त्री का लहू भी उतना ही प्रखर और पावन है।

​आज की हम लड़कियाँ भी उसी विरासत की वारिस हैं। विज्ञान हो या तकनीक, खेल का मैदान हो या सरहद,हम हर जगह अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रही हैं। लेकिन, आज इस पटल से मैं एक कड़वा सवाल भी पूछना चाहती हूँ, क्या हम वास्तव में एक विकसित समाज बन पाए हैं?

​एक तरफ हम चाँद पर तिरंगा फहराने का दंभ भरते हैं, और दूसरी तरफ आज भी हमें घर से निकलते वक्त अपनी सुरक्षा की चिंता सताती है। आज जब मैं महिला सशक्तिकरण की बात करती हूँ, तो दिल दहल जाता है। निर्भया कांड से लेकर मणिपुर की रूह कंपा देने वाली घटनाओं तक, इतिहास बार-बार शर्मसार हुआ है। आज भी हर रोज एक ‘निर्भया’ जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते हुए यही दुआ करती है कि जो उसके साथ हुआ, वह किसी और के साथ न हो।

​यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस समाज में नारी को ‘शक्ति’ कहा जाता है, उसी समाज में वह बलात्कार और दुर्व्यवहार की शिकार होती है। न्याय की प्रतीक्षा में आँखें पथरा जाती हैं, लेकिन इंसाफ कहीं अंधेरे कोने में दम तोड़ देता है। अत्याचार केवल शारीरिक नहीं होते, वे मानसिक भी होते हैं। भेदभाव और “चुप रहने” की सलाह हमारे अस्तित्व को चुनौती देते हैं। हमें अक्सर कहा जाता है कि उपयुक्त समय आने दीजिए, पर मैं पूछती हूँ, वह समय कब आएगा? क्या हम विचारों के अभाव में जी रहे हैं?

​केवल कड़े कानून बना देने से समाज की सूरत नहीं बदलेगी। शासन का अपना दायित्व है, लेकिन क्या एक नागरिक के नाते आपका और मेरा कोई कर्तव्य नहीं है? हमें अपनी संकीर्ण मानसिकता को त्यागना होगा। एक परिपक्व समाज वही है जहाँ महिला का सम्मान सुरक्षित हो। बेटों को ‘सम्मान’ करने की शिक्षा देना उतना ही ज़रूरी है जितना बेटियों को ‘सक्षम’ बनाना।

अंत में, मैं अपनी सभी बहनों से कहना चाहूँगी हम कोई चुनौती नहीं, बल्कि इस सृष्टि का आधार हैं। हमें ऐसी दुनिया का निर्माण करना है जहाँ किसी भी बेटी को यह न गिड़गिड़ाना पड़े कि अब हमें जीने दो। आइए, इस महिला दिवस पर हम एक संकल्प लें। एक संकल्प,ऐसी दुनिया बनाने का जहाँ हम निर्भय होकर साँस ले सकें।

​हौसलों की आंच से पत्थर पिघलते देखे हैं,
मैंने अपनी ज़िद से कई मंज़र बदलते देखे हैं।
ना रोक पाओगे अब इन उड़ानों को तुम कभी,
हमने सूरज की आँखों में आँखें डाल चलना सीखे हैं।

​धन्यवाद! जय भारत, जय नारी शक्ति!

प्रार्थना राय

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