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जुवारी पति के साथ रहने का दर्द – डॉ सरिता चौहान प्रवक्ता हिंदी

 

मैंने तो अपने आप को कब का मार दिया है।
मैं सिर्फ कविताओं में जीती हूं
कहानियों में दिखती हूं
नाटक में चलती हूं
मैं जानती हूं कि मैं विवाहिता हूं
इसलिए मुझसे कोई विवाह नहीं कर सकता
मुझको अपराध बोध हो चुका है कि मैं विवाहिता हूं
विवाह करना बहुत बड़ा गुनाह है
बच्चे पैदा करना उससे भी बड़ा गुनाह
रोज मर- मर के जीना
मैं जानती हूं कि दुनिया में मेरे लिए कोई जगह नहीं है
सिर्फ ऊपर जाना है धरती पर मेरे लिए कोई जगह नहीं है
जगह है तो इस पति के चरणों में
जहां मुझे घुट- घुट के जीना है
रोज मार खाना है
रोज मरना है।
पति है ना मेरा जब जी चाहे मुझे मारे
जब चाहे जो करें
मेरे रक्त धमनियों पर भी उसका अधिकार है
वह जब चाहे पी ले
ना मैं जी सकती हूं
ना ही मुझे मरने का कोई अधिकार मिला है
ना मेरे अधिकार के लिए समाज में कोई नियम है
ना कोई परंपरा
क्योंकि मैं विवाहिता हूं
हर नियम में पति के साथ बंधी हुई
एक व्यवस्था और लाचारी का बोझ उठाते हुए
समाज की रीति रिवाज मूल्य और परंपराओं को ढोती हुई
अपने आप को रोज मारती हूं।
कुंवारी थी तो पिता के लिए बोझ थी
ब्याही गई तो पति के लिए बोझ हूं
मैं नहीं बनना चाहती किसी के लिए बोझ
अपने आप को हल्का करना चाहती हूं मैं
मैं रोज-रोज घुट – घुट के मरने से
अपने आप को मार लेना बेहतर समझती हूं
इस जुवारी पति ने मेरे शरीर को पत्थर समझ रखा है
रोज ठोंकता-पीटता रहता है
हाथों के हथौड़े से रोज ही मुझ पर प्रहार करता रहता है
शरीर के हर एक हिस्से में रक्त जमा दिया है उसने
फिर भी मैं जीती हूं, पता नहीं क्यूं ?
उसके लिए पत्नी एक आम बात है
मर जाएगी तो दूसरी शादी हो जाएगी
यह उसकी सोच में बसा है।
भाग जाएगी तो उससे भी नई नवेली,
यहां तक कि कोई दूसरी कुंवारी चली आएगी
अरे वाह ! एक सामाजिक मूल्य
पता नहीं किस बात का मूल्य !
जो जीवन को जीने ना दे ,
एक स्त्री की आजादी छीन ले
बच्चे ना हों तो उसके लिए ताना
तलाक का डर ,
उसके द्वारा छोड़े जाने का भय,
भय ही नहीं एक दहशत सी है
माता-पिता की चिंता बढ़ने लगती है
अरे सहकर रहो
छोड़ दिया तो तुमसे शादी कौन करेगा
अगर बच्चे ना हों तो उसे दूसरी शादी का बहाना मिल जाएगा
लोग ताना देंगे
तुम्हारे अन्य भाई – बहनों का विवाह रुक जाएगा
इसलिए तुम्हें सहन करना होगा
मर – मर के जीना होगा
मैं ताक पर रखना चाहती हूं ऐसी परंपराओं को
ऐसे धर्म ग्रन्थों को
जिनमें सारे विधान ,नियम कानून स्त्री के लिए ही बनाए गए हैं।
पक्षपात हुआ है स्त्री के साथ
अगर वह किसी से प्रेम कर ली तो पतित्ता कहलाएगी
जीते जी मर गई तो सती हो जाएगी
क्या कभी पति के लिए सती प्रथा नहीं लागू हुआ था ?
क्या उसके लिए कोई व्रत त्यौहार नहीं बनाए गए थे
अपनी पत्नी की दीर्घायु के लिए?
मैं पूछती हूं
आखिर ऐसा क्यों?
एकतरफा धर्म ग्रंथ
ऐसी नीतियां, ऐसी मान्यताएं
ऐसी सामाजिक मूल्य और
ऐसी परंपराएं
मैं इन सबको ताक पर रखना चाहती हूं
मेरा हृदय विवश होते-होते विदीर्ण हो चुका है
मैं नहीं जीना चाहती
हर हाल में मैं मरना चाहती हूं
क्या मुझे ?मरने का भी अधिकार नहीं है!
जीने के लिए तो आजादी है ही नहीं
हम जीते जरूर हैं आजाद भारत में
पर जड़े हुए हैं नियम कानून की जंजीरों में
जकड़े हुए हैं परंपराओं और मान्यताओं में
आखिर वास्तविक जीवन है कहां?
मैं उसे पाना चाहती हूं।
कोई मेरे लिए ढूंढ कर लाओ
कोई तो मेरे मीत बन जाओ।।
स्वरचित
डॉ सरिता चौहान प्रवक्ता हिंदी
पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज गोरखपुर उत्तर प्रदेश।

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