बूढ़ी माँ की पोटली – कविता साव पश्चिम बंगाल

गाँव के पुराने पीपल के नीचे बैठी कौशल्या रोज सड़क की ओर देखती रहती थी।जिस रास्ते से उसका बेटा मोहन शहर गया था, उसी रास्ते पर उसकी आँखें अब भी टिकी थीं।मोहन को शहर गए पाँच साल हो चुके थे। शुरू-शुरू में वह हर महीने माँ को पत्र लिखता था—“अम्मा, जल्दी ही तुम्हें शहर ले आऊँगा।”फिर पत्र कम होते गए और अंततः बंद हो गए।कौशल्या फिर भी रोज दरवाजे पर बैठती।बहू-बेटे की तस्वीर उसके पास नहीं थी, इसलिए वह आने-जाने वाले हर आदमी में अपने बेटे का चेहरा खोजती।गाँव की औरतें समझातीं—“कौशल्या, अब बूढ़ी हो गई हो। बेटे का इंतजार छोड़ दो।”वह मुस्करा देती।“माँ इंतजार नहीं छोड़ती बहन, चाहे बेटा छोड़ दे।”उसके पास एक छोटी-सी कपड़े की पोटली थी। वह उसे हमेशा अपने सिरहाने रखती।एक दिन पड़ोस की बच्ची ने पूछ लिया—“दादी, इस पोटली में क्या है?”कौशल्या ने पोटली खोलकर दिखाई।अंदर कुछ पुराने सिक्के, एक टूटी हुई लकड़ी की गाड़ी और सूखे हुए दो बेर थे।“ये क्या हैं?”कौशल्या की आँखें चमक उठीं।“तेरे मोहन के बचपन की निशानियाँ हैं। ये गाड़ी उसके बाबूजी ने बनाई थी और ये बेर उसने मुझे खिलाने के लिए बचाए थे।”बच्ची हँसकर बोली—“इतनी पुरानी चीजें अब तक संभालकर रखी हैं?”कौशल्या ने पोटली बाँधते हुए कहा—“माँ के लिए पुराना कुछ नहीं होता बिटिया।”समय बीतता गया।एक सर्द रात कौशल्या बहुत बीमार पड़ गई।गाँव के मास्टरजी डॉक्टर को बुलाने गए। डॉक्टर ने देखकर कहा—“इनकी हालत कमजोर है। किसी अपने को खबर कर दीजिए।”मास्टरजी ने मोहन को फोन किया।उधर से आवाज आई—“मैं बहुत व्यस्त हूँ। पैसे भेज देता हूँ।”मास्टरजी चुप हो गए।उन्होंने फोन रख दिया।सुबह कौशल्या ने पूछा—“मोहन आया था?”मास्टरजी ने नजरें झुका लीं।“अभी नहीं।”कौशल्या मुस्करा दी।“आ जाएगा।”उसने अपनी पोटली मास्टरजी के हाथ में रख दी।“जब मोहन आए, तो उसे दे देना।”कुछ दिनों बाद कौशल्या नहीं रही।तेरहवीं के दिन मोहन गाँव पहुँचा।शहर की महँगी गाड़ी से उतरते हुए उसने चारों ओर देखा। घर वैसा ही था, बस माँ नहीं थी।मास्टरजी ने चुपचाप वह पोटली उसके हाथ में दे दी।मोहन ने खोला।सबसे ऊपर एक पुराना कागज था।उस पर काँपते हाथों से लिखा था—“मेरे मोहन के लिए—तू जब छोटा था, तो तेरी मुट्ठी में जो कुछ आता था, तू मेरे आँचल में रख देता था। अब तू बड़ा हो गया है, तो शायद मुझे याद रखने की फुर्सत नहीं रही।मैंने तेरे लिए कुछ नहीं बचाया, बस तेरी बचपन की ये छोटी-छोटी खुशियाँ बचाकर रखी हैं।जब कभी बहुत अकेला महसूस करना, इन्हें देख लेना।माँ का घर हमेशा खुला रहेगा।”मोहन देर तक उस कागज को देखता रहा।उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।उसने पोटली सीने से लगा ली।लेकिन उस दिन पहली बार उसे समझ आया—जिस माँ के पास बेटे के लिए पूरी जिंदगी थी, उसके बेटे के पास माँ के लिए कुछ पल भी नहीं थे।वह आँगन में बैठकर फूट-फूटकर रो पड़ा।पीपल के पत्ते हवा में काँप रहे थे।शायद गाँव की हवा भी उससे यही कह रही थी—“माँ चली गई, अब पछतावा किस काम का?”
कविता साव
पश्चिम बंगाल




