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वह मुस्तफ़ा, जिनके लिए क़ायनात की सारी हदें टूट गईं : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी

शबे मेअराज पर सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का पैग़ाम — यह शान-ए-नबी का खुला, रौशन और अज़ीम एलान है

 

 

शबे मेअराज के पाक, नूरानी और रूह-परवर मौक़े पर, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने ऐसी दमदार, इल्मी और जज़्बात से भरपूर तक़रीर की कि मजलिस में मौजूद, हर दिल पर, उसका गहरा असर साफ़ नज़र आया। उन्होंने कहा कि शबे मेअराज कोई आम रात नहीं, बल्कि वह अज़ीम रात है, जब ज़मीन और आसमान के बीच की तमाम हदें टूट गईं और रब्बुल आलमीन ने अपने महबूब, हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को, अपनी सबसे क़रीबी क़ुर्बत से नवाज़ा।

सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने क़ुरआन की आयत तिलावत करके बताया कि यह सफ़र महज़ जिस्मानी नहीं, बल्कि रूह की बुलंदी, बंदगी की पहचान और इश्क़-ए-रसूल की इंतिहा था।
उन्होंने कहा कि नबी-ए-करीम का मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक़्सा तक तशरीफ़ ले जाना, सिर्फ़ एक सफ़र नहीं बल्कि क़ियादत-ए-इंसानियत का एलान था। वहीं तमाम अंबिया की इमामत का शरफ़ अता हुआ, जिसने यह साबित कर दिया कि रहनुमाई-ए-कायनात, हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हाथों में है।

सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि आसमानों का सफ़र, जहां एक एक कर दरवाज़े खुलते चले गए और हर आसमान पर अंबिया-ए-किराम ने हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का वालिहाना इस्तक़बाल किया। सिदरतुल-मुन्तहा का मुक़ाम आया, जहां अक़्ल हैरान, फ़िक्र खामोश और क़लम थम गया।

उन्होंने कहा कि वहीं ख़ालिक़ और मख़लूक़ के दरमियान वह राज़ व नियाज़ हुआ, जिसकी कैफ़ियत अल्फ़ाज़ में बयान नहीं की जा सकती। यह शान-ए-मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम है कि जहां बयान ख़ामोश हो जाए, वहां भी उनकी अज़मत रोशन रहती है।

सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि इसी अज़ीम रात, उम्मत को नमाज़ जैसा महान तोहफ़ा मिला, जिसे नबी-ए-करीम ने मोमिन की मेअराज क़रार दिया। पहले पचास नमाज़ें फ़र्ज़ हुईं, मगर रहमत-ए-मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उम्मत से बोझ हल्का कर दिया। नमाज़ें पांच कर दी गईं, जबकि सवाब पचास का ही रहा। उन्होंने कहा कि यह हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शफ़ाअत और शफ़क़त की ज़िंदा मिसाल है।

सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने क़ुरआन की आयत पढ़ते हुए बताया कि शबे मेअराज दरअसल, हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की अज़मत, मक़बूलियत और रफ़अत का खुला एलान है।

अपने पैग़ाम में उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह रात हमें सिखाती है कि बुलंदी, तख़्तों से नहीं, सज्दों से मिलती है। जो बंदा सज्दे में झुकना सीख ले, वही हक़ीक़ी मेअराज तक पहुंचता है। उन्होंने कहा कि नमाज़ से रिश्ता मज़बूत किए बिना, रूहानी बुलंदी की उम्मीद करना, बेमतलब है।

अंत में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि मेअराज, सिर्फ़ प्यारे नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का सफ़र नहीं, बल्कि इंसानियत के मुक़द्दर का पैग़ाम है। यह रात बताती है कि अगर इंसान अल्लाह से जुड़ जाए, तो ज़मीन पर रहते हुए भी आसमानों की बुलंदियों को छू सकता है।

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