हादसा: जो भुला नहीं पाया — राजेन्द्र परिहार सैनिक

यों तो हादसों में ज़िन्दगी और ज़िन्दगी में हादसे आपस में गुंथे हुए हैं, हादसों बिना ज़िंदगी का सफ़र मुकम्मल भी कहां होता है। हादसों से दो चार होकर ही ज़िंदगी का अनुभव परिपक्व होता है। ऐसा ही एक भयानक हादसे की कथा सुना रहा हूं मैं।
राजेश और रजनी की नई नई शादी हुई थी। राजेश एक धनाढ्य परिवार से था जबकि रजनी एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी,किंतु दोनों ही पढ़े लिखे और होनहार प्रतिभाएं थीं। दोनों की जोड़ी हर एक कोण से परफेक्ट जोड़ी थी। विवाह के कुछ दिनों बाद ही परिवार की सहमति से हनीमून मनाने के लिए रवाना हुए थे। हंसते मुस्कुराते हुए घर से विदा हुए, ट्रेन के ए सी कोच में ऊपर की बर्थ पर रिज़र्वेशन था लिहाज़ा दोनों ही हनीमून के सुंदर अहसासों को मन में संजोए हुए अपनी सीट पर सो गए। हालांकि नींद दोनों की आंखों में नहीं थी आपस में हंसी मज़ाक और कस्में वादे और भविष्य की योजनाओं पर वार्तालाप चलता रहा और ट्रेन अपने गंतव्य की ओर सटासट बढ़े जा रही थी।रजनी के हाथों पैरों में खूबसूरत मेहंदी और पायल और नववधू का पूरा श्रृंगार और दमकता आशाओं से दमकता चेहरा उसकी
अगाध खुशी को उजागर कर रहा था। आधी रात के बाद दोनों नींद और सपनों के आगोश में गुम हुए ही थे कि अचानक एक भयंकर धमाका हुआ और उनका कोच चकनाचूर हो गया था।भीषण दुर्घटना दो ट्रेन आमने-सामने से टकराई और चीखों भरा मंजर चारों तरफ़ पसर गया। कौन बचा,कौन मौत के गाल में समा गया किसी को खबर नहीं थी। राजेश की तो चीख भी नहीं निकली और रजनी बुरी तरह घायल हो चुकी थी और बेहोशी में कराहते हुए राजेश का नाम लिए जा रही थी। दस मिनट बाद उसे होश आया और दो बर्थो के बीच में फंसी हुई राजेश की वीभत्स लाश को देखा,, उसके मुंह से एक चीख निकली रा,,,जे,,,श,, और आंखों में अंधेरा छा गया और अवचेतन शरीर धीरे धीरे गहन अन्धकार में खो गया। रजनी भी राजेश के साथ
ही अनंत के सफ़र पर साथ ही चली गई। मातम ही मातम शेष रह गया था। नवविवाहित जोड़ा पुनः एक दूसरे का हाथ थामे अनंत सफ़र पर उड़ा चला जा रहा था।
राजेन्द्र परिहार सैनिक




