परहित (संस्मरण) — राजेन्द्र परिहार “सैनिक” कोटा (राजस्थान)

यह बात तब की है जब हमारे मोहल्ले में एक वृद्ध दंपति अकेले रहते थे। उनके बेटे नौकरी के सिलसिले में बाहर रहते थे और महीने-दो महीने में ही घर आ पाते थे।
उम्र और अस्वस्थता के कारण उनका दैनिक जीवन कठिन हो गया था पर वे किसी से सहायता माँगने में संकोच करते थे।
एक दिन तेज़ बारिश के कारण मोहल्ले में जलभराव हो गया।
उसी दौरान खबर मिली कि वृद्ध दंपति का घर पानी से घिर गया है और उन्हें दवा की सख़्त आवश्यकता है।
यह सुनते ही कुछ पड़ोसी, जिनमें मैं भी शामिल था, बिना देर किए उनके घर पहुँचे। किसी ने दवाइयों की व्यवस्था की, किसी ने भोजन पहुँचाया, तो किसी ने घर की साफ़-सफाई में हाथ बँटाया।
उस समय किसी ने यह नहीं सोचा कि यह उनका काम है या नहीं
बस इतना समझ लिया गया कि किसी का कष्ट कम करना ही सबसे बड़ा धर्म है।
वृद्ध दंपति की आँखों में उस दिन कृतज्ञता के आँसू थे, वे बार-बार हाथ जोड़कर धन्यवाद करते रहे, पर उस क्षण मुझे लगा कि असली धन्यवाद हमें नहीं, बल्कि मानवता को मिल रहा है।
उस छोटी-सी सेवा ने उनके चेहरे पर जो संतोष और भरोसा जगाया, वही हमारे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार था।
उस घटना ने मुझे सिखाया कि #परहित कोई बड़ा या असाधारण कार्य नहीं होता।
समय पर दिया गया सहयोग, संवेदनशील व्यवहार और निःस्वार्थ भाव ही परहित की सच्ची पहचान हैं।
जब हम दूसरों के दुख में सहभागी बनते हैं तब न केवल उनका जीवन आसान होता है बल्कि हमारा अपना जीवन भी अर्थपूर्ण बन जाता है।
यही परहित का वास्तविक स्वरूप है।
राजेन्द्र परिहार “सैनिक”
कोटा (राजस्थान)




