अधिकार विहीन पत्नी — डॉ सरिता चौहान
हर आहट में मैं तुझे महसूस करती हूं।
पास होकर भी तुम मुझसे दूर रहते हो।
तेरे दिल में मैं बस नहीं पाती ।
तेरी आंखों तक जाकर मैं उतर आती हूं।
पता नहीं क्यूं।
क्या ही कर सकती हूं।
अपने आप को तो मैं मार नहीं सकती।
क्योंकि मैं जिंदा रहना चाहती हूं।
गलती यही है कि मैं फ़िदा रहती हूं।
तुझ पर और तेरी झूठी दीवानगी पर।
बार-बार धोखा खाती हूं फिर भी भूल जाती हूं।
उम्र भर तेरे साथ रहने की गुजारिश करती हूं।
पता नहीं क्यूं।
मैं अधिकार विहीन पत्नी हूं ऐसी ,
जैसे कि सांस विहीन जीवन।
फिर भी मैं जीती हूं।
आहें भर – भर कर भी मुस्कुराती रहती हूं।
तेरे साथ जीने की ख्वाहिश रखती हूं।
पता नहीं क्यूं।
तुझे मरते नहीं देख सकती।
तुझे मारना भी नहीं चाहती।
तेरी सांसे तेरे लिए कभी कम ना पड़े
इसलिए अपनी सांसे भी तुझ में डाल देना चाहती हूं।
तेरे साथ जीना नहीं चाहती
फिर भी जीती हूं।
पता नहीं क्यूं।
मैं जीते जीते मर गई हूं
तू मरते मरते जी गया है।
पर कोई ताल- मेल नहीं है जिंदगी में
तेरे और मेरे।
यह जानते हुए भी कि बिना ताल के
जिंदगी बेकार है।
पर जीती हूं
पता नहीं क्यूं।
आखिर इन रिश्तों में क्या ऐसा राज है।
जो ना चाहते हुए भी जबरदस्ती करती है
साथ जीने की ।
ऐसे में जिंदगी है ही कहां
हर पल जहर का घूंट पीती हूं
पर जीती हूं ।
पता नहीं क्यूं।
मैं हार गई हूं फिर भी धमनियों में रक्त दौड़ाती रहती हूं।
किस्मत पर आंसू बहाती रहती हूं।
दिन – रात अपने आप को चक्की में पिसती रहती हूं
और पस्त हो जाती हूं।
पस्त होकर भी उठकर खड़ी हो जाती हूं।
पता नहीं क्यूं।
तुम्हारे कमाए हुए रूपयों को
दिन रात इकट्ठा करने की कोशिश में लगी रहती हूं।
यह जानते हुए भी कि वह रुपए मेरे नहीं हैं
क्योंकि मैं अधिकार विहीन पत्नी हूं ।
फिर भी यह सब करती हूं।
पता नहीं क्यूं।
शायद इसलिए कि
मेरी संचय करने की प्रवृत्ति है।
जीवन की संवाहिका,
मेरे प्राण वायु की संपोषिका
मन में मधुर विचार भरने वाली
मीठी वाणी देने वाली
शायद मां सरस्वती का अमर वरदान मिला हो मुझे।
यहीं तक नहीं है जीवन की यह कहानी,
आघात पर आघात ,
कुठाराघात पर कुठाराघात सहती रही।
पर मेरी अंबे मुझ पर अमृत वर्षा करती रहीं।
कैसे भूलूं मैं उनके इस उपकार को,
जिनके संबल से असहनीय दर्द को मैं सहती रही।
पति के साथ-साथ समाज भी पीड़ा देता रहा।
पर मैं क्या करती।
मैं सहती रही पर हर ना मानी
चाहे जीत अभी मिले या जीवन के अंतिम समय में मिले
या फिर मृत्यु आने तक ना मिले
पर मैं हार ना मानूंगी ।
ऐसे ही संघर्षों से जूझती रहूंगी।
अपने स्व को पाने के लिए प्रयत्नशील रहूंगी।
चाहे हालात जो भी हों,
मैं और मेरी कविता हम दोनों एक साथ हैं।।
स्वरचित
डॉ सरिता चौहान पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज गोरखपुर उत्तर प्रदेश।




