सरसी छंद – चलो गाँव की ओर – दुष्यन्त द्विवेदी “सुयश” की कलम से
चकाचौंध जब देखी शहरी, मन में उठा हुलास।
छोड़ गाँव को रहें नगर में, जीवन करें विकास।।
कुछ दिन बीते बड़े मजे से, राशन था जब पास।
यार बने सब नए नए वो, बढ़ती मन की प्यास।।
रिश्ते नाते नए बने थे, सबने मिल दी आस।
खत्म हुआ जब राशन मेरा, दूर हुए सब खास।।
भूख लगी जब मुझे सताने, लगी उखड़ने सांस।
चकाचौंध जब देखी शहरी, मन में उठा हुलास।।
यहाँ लगे जब भूखों मरने, नहीं मिला कुछ काम।
याद गाँव की आती अब तो, लौट चले निज धाम।।
जैसे तैसे काटी रातें, घर की आये याद।
माँ के हाथ बनी रोटी का, कैसे भूलूँ स्वाद।।
आया घर जब सबको देखा, पाये अपने खास।
चकाचौंध जब देखी शहरी, मन में उठा हुलास।।
सुखद गाँव की माटी है यह, दिल को मिलता चैन।
हर्षित हैं अब मन से पूरे, चमक उठे हैं नैन।।
बैलों की जब घण्टी बजती, सुखमय होती भोर।
मंदिर की झालर बजते ही, खुश हो नाचे मोर।।
कलकल धारा नदिया बहती, बढ़ा रही है प्यास।
चकाचौंध जब शहरी देखी, मन में उठा हुलास।।
बैठ अथाई गप्पें होती, होती गाना होड़।
सभी सुनाते अपनी धुन में, लाज शर्म को छोड़।।
सुबह शाम नित मंदिर जाते, गाते प्रभु के गीत।
सब मिल कर रामायण पढ़ते, चलती आई रीत।।
बच्चे भी यह सीख रहे हैं, रहकर मेरे पास।
चकाचौंध जब शहरी देखी, मन में उठा हुलास।।
दुष्यन्त द्विवेदी “सुयश”
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