विरासत — डॉ इंदु भार्गव जयपुर

विरासत — डॉ इंदु भार्गव जयपुर
गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना-सा घर था। मिट्टी की दीवारों पर समय की झुर्रियाँ थीं और आँगन के बीचोंबीच एक बूढ़ा नीम का पेड़ खड़ा था। उसी घर में रामदीन अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसका इकलौता बेटा मोहन शहर में नौकरी करता था।
रामदीन के पास धन-दौलत के नाम पर कुछ नहीं था। बस एक छोटी-सी जमीन, पुराना घर और नीम का पेड़—जिसे वह अपनी सबसे बड़ी विरासत मानता था।
हर बार जब मोहन गाँव आता, पिता से कहता, “बाबा, यह पुराना घर बेच दो। जमीन भी बेचकर शहर चलो। वहाँ मैं तुम्हारे लिए अच्छा-सा मकान ले दूँगा।”
रामदीन मुस्कुरा देता, “बेटा, घर ईंट-पत्थर का नहीं होता। इसमें लोगों की साँसें रहती हैं।”
मोहन हँसकर बात टाल देता।
कुछ वर्षों बाद रामदीन बहुत बीमार पड़ गया। अस्पताल ले जाते समय उसने मोहन का हाथ पकड़कर कहा, “बेटा, मेरे जाने के बाद यह घर मत बेचना।”
मोहन ने वादा कर दिया।
लेकिन पिता के अंतिम संस्कार के बाद शहर लौटते ही उसे दलाल का फोन आया। जमीन और घर के अच्छे पैसे मिल रहे थे। मोहन ने सोचा—“बाबा होते तो शायद रोकते, अब तो यह सब मेरे ही काम आएगा।”
कुछ दिनों बाद वह गाँव पहुँचा। घर खाली पड़ा था। आँगन में नीम का पेड़ हवा के साथ धीरे-धीरे झूम रहा था।
मोहन ने आखिरी बार घर की चौखट को छुआ। तभी उसकी नजर दीवार पर टंगी पिता की पुरानी कमीज़ पर पड़ी। जेब में एक मुड़ा हुआ कागज था।
उस पर काँपते हाथों से लिखा था—
“मोहन,
मैं तुम्हें धन नहीं दे सका। यह घर भी शायद तुम्हें छोटा लगे। मगर याद रखना, इसी आँगन में तुमने पहला कदम रखा था। इसी नीम के नीचे बैठकर तुमने मुझे पहली बार ‘बाबा’ कहा था। अगर कभी दुनिया में तुम्हें लगे कि तुम्हारा अपना कोई नहीं है, तो इस घर में लौट आना। मैं न रहूँ, फिर भी मेरी यादें तुम्हें बाँहों में भर लेंगी।”
मोहन की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे पहली बार समझ आया कि विरासत वह नहीं होती जिसे बेचकर पैसा मिल जाए। विरासत तो वह होती है जिसे खो देने के बाद इंसान सारी उम्र ढूँढ़ता रहता है।
उसने दलाल को फोन किया।
“घर नहीं बिकेगा।”
“क्यों साहब? इतनी अच्छी कीमत मिल रही है!”
मोहन ने नीम के पेड़ की ओर देखा और धीमे से कहा—
“क्योंकि इसकी कीमत मेरे बाबा की आखिरी साँसों से भी बड़ी नहीं हो सकती।”
उस दिन उसने घर नहीं बेचा।
बल्कि नीम के नीचे पिता की एक छोटी-सी तस्वीर रख दी।
और हर साल पिता की बरसी पर शहर से गाँव आता, उस तस्वीर के सामने बैठता और देर तक चुप रहता।
शायद यही उसकी असली विरासत थी—एक पिता का प्रेम, जो मृत्यु के बाद भी बेटे के भीतर जीवित रहा!!
डॉ इंदु भार्गव जयपुर




