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स्वार्थ की आग घर को नरक बना देती है।लोकेश झा

परिवार में जहां स्वार्थ आ जाता है, वह घर बिखर जाता है।

 

परिवार वह पवित्र मंदिर है, जहाँ प्यार, समझ और त्याग की हवाएँ बहती हैं। लेकिन जैसे ही स्वार्थ की आग भीतर घुसती है, वही घर नरक बन जाता है। संपत्ति, सत्ता, दिखावा और खुद की अहमियत – ये सभी चीजें रिश्तों की आत्मा को काट देती हैं। स्वार्थियों के घर में प्यार बिकाऊ हो जाता है, भावनाएँ सौदेबाजी की वस्तु बन जाती हैं। भाई-बहन, माता-पिता, पति-पत्नी – कोई भी इस जहर से अछूता नहीं रहता। हर बात तौलने लगती है: “मुझे क्या मिलेगा?” और धीरे-धीरे वह घर प्यार की जगह डर, शक और झगड़ों का अड्डा बन जाता है।ऐसे घरों में छोटी-छोटी खुशियाँ गँवाँ दी जाती हैं। रिश्ते सिर्फ दिखावे के लिए रह जाते हैं। बच्चे भी सिर्फ स्वार्थ की सोच देखकर बड़े होते हैं, और यह जहरीला फन भविष्य की पीढ़ियों तक फैल जाता है। स्वार्थियों के लिए चेतावनी – याद रखो, कोई भी रिश्ता हमेशा के लिए नहीं टिकता। तुम्हारे लालच और खुदगर्जी ने उस घर को जन्नत से नरक में बदल दिया है। और एक दिन, वही घर, वही लोग, वही रिश्ते – सब तुम्हें अकेले छोड़ देंगे। सच्चा परिवार वही है जहाँ प्यार, समझ और त्याग की हवा बहती है। स्वार्थियों को सिर्फ कड़वा सच दिखाओ – जिस घर में स्वार्थ आता है, वहां कोई सुकून नहीं, केवल बिखराव और अफ़सोस होता है। परिवार कोई बाजार नहीं, और रिश्ते कोई लेन-देन नहीं। स्वार्थ का रास्ता छोटा और मीठा लगता है, लेकिन अंत में वह सिर्फ आग और राख छोड़ता है।

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