प्रतियोगिता में भागीदारी कैसे बढ़ाई जाए — मीनाक्षी सुकुमारन नोएडा

प्रतियोगिता हमारे जन्म से ही हमारे साथ शुरू हो जाती है पहले स्कूल के दाखिले की, फिर परीक्षाओं व अन्य प्रतियोगितायों की खेलकूद प्रतिस्पर्धी, ड्रॉइंग, प्रोजेक्ट्स, वाद विवाद, संगीत, नृत्य और न जाने कितनी ही। उसके बाद कॉलेज, फिर नौकरी वहां सब की नज़रों में खरा उतरना, कामकाज की परख, समय की उपयोगिता, डेडलाइन आदि। यूँ प्रतियोगिता और भागम भाग चलती रहती है।इस पूरे चक्र में जब कभी हमें अपनी अधूरी आशाओं, सपनों , अभिलाषा, शौंक को पूरा करने का अवसर मिले तो वहां भी स्पर्धा, प्रतियोगिता हमारा इंतज़ार कर रही होती है उन लोगों से जो अपना नाम, पहचान बना अच्छी खासी शोहरत, यश, सिद्धि पा चुके हैं। लोग आपको पीछे धकेलने की पूरी कोशिश करते हैं अलग अलग तरह से कभी आपके शौंक का, हुनुर का मज़ाक उड़ा कर, नौसिखिया कहकर या बार बार आपके आत्मसम्मान व आत्मविश्वास पर चोट करके धोखा देकर, षडयंत्र रच कर ताकि इस स्पर्धा या प्रतियोगिता में कोई उनसे आगे न निकल जाए, अपनी पहचान न बना ले…इस तरह की insecuriry उन्हें हर बुरे से बुरा काम करने पर मजबूर कर देती है जिससे कभी न कभी देर सवेर ऐसे लोग अपने ही बने जाल में फंस जाते हैं।क्योंकि वो कहते हैं न किसी की किस्मत, भाग्य उससे कोई नहीं छीन सकता जो जिस के नसीब में होता है वो उसे मिलकर ही रहता है।पहले आकाशवाणी रेडियो हो या समाचार पत्रों के दफ्तर अपनी सिद्धहस्तता अपनी आवाज़, लेखनी, हुनर से करनी पड़ती थी और काफी मेहनत मशक्त भी करनी पड़ती थी। रात रात भर स्क्रिप्ट लिखो, लेख, कविता आदि फिर कोई गलती निकले उसे सुधारो फिर approve करवाओ यूँ अच्छी खासी भागा दौड़ी और मेहनत लगती थी।
पर जैसे ही समय बदला, मोबाइल व अन्य उपकरणों का हमारे जीवन में प्रवेश हुआ साथ ही फ़ेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम व अन्य कई प्लेटफार्म का भी जन्म हुआ। एक होड़ सी लग गई अब तो न जाने कितने ही समूह जहां अलग अलग प्रतिस्पर्धा होती हैं विषयों की, काव्य आयोजन, लाइव प्रस्तुति, गूगल मीट, यू ट्यूब प्रस्तुति ….इस तरह दायरा, आकार, प्रतिस्पर्धा व प्रतियोगिता नित नए रूप में बढ़ती ही जा रही हैं।यहाँ सवाल ये उठता है आखिर एक व्यक्ति कितना भागे, कहाँ कहाँ हिस्सा ले, किस किस की कसौटी पर खरा उतरे सब के अपने अपने नियम,मापदंड, अपेक्षाएं, तरीके … यहाँ भी जीवन अच्छा खासा अखाड़ा बन गया है बिना बात के तनाव, बिना बात की प्रतिस्पर्धा। मन की बात, एहसास, भाव, भावनाओं को मीटर, लयबद्धता, छंदबद्धता, तकनीक, पंक्तियों , मात्रा आदि न जाने कितने ही पैमानों पर आंका जाता है। इस प्रतियोगिता में भी योग्यता , आवरण को सराहना मिलती है सरलता, कोमलता कहीं खोकर रह जाती है जो मूल्याकंन के किसी पैमाने पर खरी नहीं उतरती बस प्रतियोगिता से बाहर ठगी सी खड़ी रहती है ऐसे में प्रतियोगिता_में_भागीदारी_कैसे_बढ़ाई_जाए सवाल का सवाल ही रह जाता है क्योंकि यहां भी बड़े नाम, पहचान, भागीदारी रुकावट बन रोड़ा बन जाती है और शौंक प्रतियोगिता बन जाता है हार जीत के दायरे में सिमट कर। यूँ दौर कोई भी हो समय कोई भी कभी कुछ नहीं बदलता।
….मीनाक्षी सुकुमारन
नोएडा




