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वर्तमान समय गीता ज्ञान से युग परिवर्तन — डॉ शुचिता नेगी

भगवान के श्री मुख से गाई हुई गीता का सार है नष्टोमोहा स्मृतिर् लब्धा। इस संसार में सत्य क्या है और झूठ क्या है इसकी संपूर्ण जानकारी तो एक सत्य भगवान ही दे सकते हैं जो उन्होंने गीता ज्ञान द्वारा अर्जुन को निमित्त बनाकर सारे विश्व के मनुष्यों के लिए दी है। अर्जुन अपने सगे संबंधियों को सामने देखकर युद्ध करने से मना करता है तो भगवान उसे समझाते हैं कि यह धर्म युद्ध है अर्थात यह युद्ध करना तुम्हारा धर्म है। यदि अपने इस धर्म युद्ध (धारण करने का पुरुषार्थ) को पालन नहीं करोगे तो संसार में तुम्हारी ग्लानि होगी, तुम कायर कहलाए जाओगे। यदि तुम इस सत धर्म (मन में सद्गुणों की धारणा) के युद्ध में मृत्यु को भी प्राप्त होते हो तो भी स्वर्ग में जाओगे ।यहां इस धर्म युद्ध से भगवान का तात्पर्य है अपने अंदर छुपे पांच विकारों (दुर्गुणों )से लड़ना ।इनमें पहला विकार है मोह का ,मनुष्य को सबसे अधिक मोह अपनी देह से होता है फिर देह के मित्र संबंधी आदि से भी क्रमवार मोह विस्तार को पाता है ।इसलिए भगवान कहते हैं इस मोह को नष्ट करके अपने सत्य आत्मिक ज्योति स्वरूप को याद करो ।यह शरीर, संबंधी आदि पहले भी नहीं थे, आगे भी नहीं रहेंगे क्योंकि देह तो प्रकृति के पांच तत्वों का पुतला है जो विनाशी है और तुम इस शरीर रुपी रथ के रथी ( रथ को धारण करने वाली) चैतन्य आत्मा हो। आत्मा अतिसूक्ष्म है जो इन आंखों से देखी नहीं जा सकती है लेकिन बुद्धि द्वारा अनुभव की जा सकती है तो अब मैं तुम्हें कहता हूं कि संसार की सभी विनाशी चीजों (देह , पदार्थ संबंधी आदि सभी से) मोह नष्ट करके उनके प्रति जो झूठा लगाव मन में है ,उसे मारना है ।यदि तू इस धर्म युद्ध में विजयी हुआ तो विश्व की राजाई प्राप्त करेगा क्योंकि जिसने स्वयं का मन जीता है उसने समझो जगत को जीत लिया । चूंकि देह, देह के संबंधियों और पदार्थों के प्रति लगाव( मेरापन का भाव) के संस्कार पिछले अनेक जन्मों के हैं इसलिए एकाएक नष्ट नहीं होंगे तो उसके लिए भगवान युक्ति बताते हैं कि निरंतर अभ्यास और वैराग्य से यह सहज हो जाएगा ।वर्तमान समय युग परिवर्तन का है जब चारों ओर से विनाश की घंटियां सुनाई दे रही है और यही अवसर है विनाशी चीजों से वैराग्य बुद्धि में धारण करके अपने सत्य अविनाशी स्वरूप की स्मृति में रहने का निरंतर अभ्यास करना।

डॉ शुचिता नेगी
संगमनेर महाराष्ट्र

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