अनंत प्रेम — शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’

रात सूनसान सुबह की ओर चुपचाप चली जा रही है पर नीरजा की आंखों से नींद गायब है। बिस्तर छोड़कर उठ बैठी वो और बाहर आंगन में आकर टहलने लगी। दिन भर गंगा के तट पर घूमती रही अकेली, जाने किसे तलाश कर रही थी।
शाम तक पैर दुखने लगे तो रास्ते से थोड़ा खाना बंधवा कर होटल के कमरे में आकर खाया और सोने की कोशिश करती रही। आंख लगी भी पर जल्द ही खुल गई। कमरे की खिड़की से देखा बाहर शीतल आंगन में बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे चुपचाप चबूतरा जैसे बुला रहा था उसे। दरवाजा खोलकर बाहर आ गई। बरगद के नीचे चबूतरे पर बैठ गई। बड़ी सुहानी हवा चल रही थी। बड़ी सुखद सी अनुभूति हुई नीरजा को, जैसे इसी की तलाश में आई है यहां, दिनभर इसे ही ढूंढती हुई भटक रही थी, गंगा के इस छोर से उस छोर तक। पांव फ़ैला कर पेड़ के सहारे आंखें मूंद कर बैठ गई और एक रूमानी से आगोश में खुद को महसूस करने लगी। ये खुशबू उसकी जानी पहचानी है। किसी की बाहों के हसीन घेरे में उसकी सांसें तेज़ चल रहीं थीं।
बरगद के नीचे नीरजा की पलकों पर नींद की नरम परछाइयाँ उतरने लगीं। हवा में गंगा के जल की नम गंध घुली थी और उस पर एक अजीब सी मीठी-सी सुगंध भी… जैसे किसी पुराने समय की याद महक रही हो।
अचानक उसे लगा जैसे कोई उसके बिल्कुल पास बैठ गया है। एक धीमी, सर्दाहट भरी फुसफुसाहट उसके कानों से टकराई—
तुम आ ही गईं नीरजा।
नीरजा ने चौंक कर आंखें खोलीं। सामने कोई नहीं था, सिर्फ बरगद की मोटी शाखाएँ, जिनसे सफेद फूलों जैसी छोटी-छोटी पत्तियाँ टपक रही थीं। हवा थोड़ी ठंडी हो गई थी। पर उसकी सांसें अब भी अजीब सी गर्म थीं, जैसे सच में किसी के आगोश में थी।
वो उठने को हुई, पर पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए। तभी चबूतरे की मिट्टी से कुछ उभरने लगा—जैसे कोई भूला बिसरा चेहरा। धुंधला, पर परिचित। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। वो चेहरा वही था… जिसे उसने बरसों पहले खो दिया था, और कभी किसी मोड़ पर फिर मिलने का वादा किया था।
“नीरजा…” फिर वही फुसफुसाहट।
“मैं अब भी तेरा इंतज़ार करता हूँ। इस चबूतरे पर, हर उस रात जब चाँद गंगा में अपनी परछाई उतारता है।”
उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसने हाथ बढ़ाया उस धुँधली आकृति की ओर… लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियाँ उस धुएँ से बने चेहरे को छूने को हुईं, एक सर्द लहर पूरे बदन में दौड़ गई। बरगद का पेड़ अचानक कराह सा उठा और उसके नीचे की धरती से ठंडी हवा का झोंका निकल पड़ा।
नीरजा डर से काँप उठी। उसे अब याद आया—यह वही चबूतरा था जहाँ सदियों पहले दो प्रेमियों की दर्दनाक कहानी दबी थी। कहा जाता था कि जो भी सच्चे दिल से अपने बिछड़े प्रेमी को पुकारे, उसे वह चबूतरा एक रात के लिए लौटा देता है… लेकिन फिर कभी लौटने नहीं देता।
नीरजा ने चाहा कि वह दौड़ जाए, होटल वापस भाग जाए। पर उसके कदम भारी हो गए थे, जैसे बरगद की जड़ों ने उसे थाम लिया हो। वह एक बार फिर उस धुँधली आकृति की ओर देखती रही—वो अब मुस्कुरा रहा था, वही पुराना स्नेह, वही अपरिभाषित वादा।
धीरे-धीरे उसकी चेतना धुंधलाने लगी। उसे लगा, वो उठी, उसके हाथों को थामा, और दोनों बरगद की जड़ों में समा गए… हवा में बस उस मीठी, जानी-पहचानी खुशबू का एक हल्का सा बादल रह गया।
सुबह जब सूरज की पहली किरणें गंगा पर फैलीं, होटलवालों ने देखा—चबूतरे पर बरगद की जड़ों के बीच एक नया अंकुर फूटा था, जिसके पास एक गुलाबी दुपट्टा लहरा रहा था।
“जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ अंत नहीं होता।”
शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’




