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लघुकथा: कच्चे धागों का अटूट बंधन  – पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर गुजरात)

 

धागा कच्चा है पर रिश्ता बहुत मजबूत होता हैदूरियां रिश्तों को नहीं तोड़ती अगर रिश्ता मन से जुड़े हो। कच्चे धागे का अटूट बंधन होता है।छोटा सा गांव में मां और बेटी रहते थे।मीना को भाई नहीं था। उसके घर के पास एक मकान खाली पड़ा था उसमें भावेश रहने के लिए आया।भावेश और उसकी पत्नी रेखा बहुत अच्छे थे।मीना जब काम पर जाती थी तो उसकी मां का ख्याल रखते थे। एक दिन रक्षाबंधन का त्योहार आया। मीना ने भावेश की कलाई पर राखी बाध कर उसको भाई मान लिया। हर रक्षाबंधन पर मीना भावेश को राखी बांधती थी।भावेश को भी बहन नहीं थी।भावेश भी मिना की इज्जत करता था।चारों एक परिवार की तरह रहता था।मीना की शादी भी हो गई लेकिन भाई बहन का प्रेम वैसा ही बना रहा।हर रक्षाबंधन पर मीना अपने मायके आती और भावेश की कलाई पर राखी बांधती थी। भावेश मीना को कुछ न कुछ भेंट देता था।एक बार भावेश ने हंसकर कहा;’मीना ये धागा इतना कमजोर है फिर भी तू इसे इतना मजबूत क्यों मानती हो’।मीना बहुत होशियार थी उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया;’भावेश यह सूतर का धागा कच्चा है लेकिन इसमें हमारा विश्वास बंधा हुआ है। इसे कोई ताकत नहीं तोड़ सकती।मीना की मांने भी कहा;’मीना उनकी ताकत मोटाई में नहीं उन्हें थामें रखने वाले रिश्तो में होती है। उस दिन उसकी समझ में नहीं आया पर कुछ बंधन दिखाई नहीं देते फिर भी जीवन की सबसे मजबूत डोर बन जाते हैं।एक बार भावेश की पत्नी रेखा बहुत बीमार हो गई। मीना को पता चला तो वह तुरंत दौड़ी आई।साथ में कुछ पैसे लेकर भी आई थी। बहन को देखकर भावेश की आंखे भर गई। उसने कहा मीना आज समझ में आया कि राखी सिर्फ कलाई पर नहीं बंधती यह तो दिलों को बांधती है।
कुछ वर्ष के बाद मीना की मां बीमार पड़ गई। उसके बच्चे की परीक्षाएं चल रही थी। मीना ने भावेश को कहा;’भाई मां बीमार है पर मैं नहीं आ सकती।आप और भाभी दोनों मां को संभाल लेना।
भावेश और रेखा दोनों ने मां की बहुत सेवा की और स्वस्थ किया। मीना भी अपनी मां की खबर लेने आई। माने दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर कहां मेरे बच्चे तुम्हारे प्रेम से मुझे आज नया जीवन मिला है। उस दिन भावेश की कलाई पर राखी को देखते हुए कहा सच में यह कच्चा धागा हमारे रिश्तों का सबसे मजबूत सहारा है। कच्चे धागे का यह बंधन सचमुच अटूट होता है।

“मिलन हो या दूरियां प्रेम रहे भरपूर,
अमर प्रेम की डोर से रहना कभी न दूर।”

पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर गुजरात)

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