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महाशिवरात्रि का ईश्वरीय संदेश  — शुचिता नेगी

सदा सत; पवित्र; चैतन्य ;आनंद ज्ञान स्वरूप एक सदाशिव ही है जो हम आत्माओं की जड़त्व मयी हो चुकी चेतना को जगाने का कार्य कर रहे हैं। हम आत्माएं प्रकृति के पांच तत्वों से बने शरीर; पदार्थ आदि से एकाकार होकर अपनी मूल चेतना को भूल बैठे हैं। आज हम सभी का जीवन अंधकार में ;दुखों से और वेदनाओं से भरा हुआ है उसका मूल कारण अपने चेतना की विस्मृति ही है। हमें अपने पिता सदाशिव की तरह अपने सत पवित्र चैतन्य स्वरूप की स्मृति में निरंतर रहने का अभ्यास करना है और इस पुरानी कलियुगी दुनिया से वैराग्य भी बुद्धि में धारण करना है ।हमारे पिता के इसी स्वरूप की यादगार शिवलिंग है जिसमें लिंग ऐसा साकारी शरीर है जिसकी हाथ’ पांव ‘आंख आदि इंद्रियां दिखाई नहीं जाती है अर्थात इन इंद्रियों से काम करते भी उनमें मैं मेरापन का भाव नहीं है; कर्म करते भी उसका लेप छेप नहीं लगता क्योंकि कर्म करते समय अपनी चेतना की स्मृति सदा बनी रहती है जो लिंग के बीच में बिंदु लगाकर दिखाया जाता है ।असत्य सदा काल टिकता नहीं है और सत्य का कभी विनाश नहीं होता: यह शरीर पदार्थ परिस्थितियां आदि कभी भी एक समान सदा काल के लिए नहीं टिकती और इन सभी की साक्षी दृष्टा चेतन ज्योति स्वरूप आत्मा पहले भी थी ;अभी भी है ;और आगे भी रहेगी क्योंकि वह सत्य है इसलिए अविनाशी है। ऐसा निरंतर कर्म करते अपनी चेतना की स्मृति का अभ्यास और कर्म करते भी विनाशी चीजों से वैराग्य की अवस्था बनाने की शिक्षा देने वाले हमारे परमपिता परमात्मा शिव भगवान 5000 वर्ष के पूरे कल्प में सृष्टि पर एक ही बार इस पावन संगम युग पर यह विचित्र ज्ञान देते हैं जो किसी भी शास्त्र आदि में नहीं मिलता। संगम युग का अर्थ ही है पुरानी कलयुगी अंधकार मयी दुनिया के विनाश का और नई पावन तेजो मयी सतयुग की दुनिया की स्थापना का मेल या संगम का समय । यही महाशिवरात्रि का समय है जब भगवान शिव हमें जड़त्व हो चुकी चेतना को अंधकार से पवित्र सत्य ज्ञान के तेजो मयी ज्योतिस्वरूप में ले जाने का मार्ग बताने आते हैं। इसलिए भगवान शिव की ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा अर्चना भक्तगण करते हैं ।अब भगवान कहते हैं मैं तुम्हें तुम्हारी भक्ति का फल यह सच्चा ज्ञान देने आया हूं; तुम्हें यह लक्ष्य देने आया हूं कि इस समय पुरुषार्थ करके अपनी खोई हुई चेतना (स्मृति) को पुनः प्राप्त कर लो जिससे तुम्हें जन्म-जन्मांतर किसी से कोई याचना प्रार्थना नहीं करनी पड़े।

ओम शांति।
शुचिता नेगी

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