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मनुस्मृति: एक संक्षिप्त विश्लेषण’ — -डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

 

ऋषि मनु द्वारा रचित ‘मनुस्मृति’ प्राचीन भारतीय समाज की एक विस्तृत आचार-संहिता है, जिसमें १२ अध्यायों और २६९४ श्लोकों के माध्यम से सृष्टि उत्पत्ति, राजधर्म, न्याय व्यवस्था और संस्कारों का वर्णन किया गया है। इसे ‘मानव धर्मशास्त्र’ भी कहा जाता है, जिसने आधुनिक हिंदू कानून के विकास में आधारभूत भूमिका निभाई है। विशेषकर संपत्ति के उत्तराधिकार और कराधान (Taxation) के इसके सिद्धांत आज भी शोध का विषय हैं।
हालाँकि, वर्तमान लोकतांत्रिक परिवेश में इसकी प्रासंगिकता विवादास्पद है। जहाँ सत्य और इंद्रिय निग्रह जैसे इसके नैतिक मूल्य सार्वभौमिक हैं, वहीं जन्म-आधारित वर्ण व्यवस्था और स्त्री-पुरुष असमानता संबंधी प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद १४ और १५ (समानता का अधिकार) के विपरीत हैं।
मनुस्मृति को आज एक कठोर नियम-पुस्तक के बजाय एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दस्तावेज़ के रूप में देखा जाना चाहिए। हमें इसकी रूढ़ियों को त्यागकर केवल इसके शाश्वत नैतिक मूल्यों को ही ग्रहण करना चाहिए।

-डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

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