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अन्न ही अन्नपूर्णा है  — कविता साव पश्चिम बंगाल

 

अन्न केवल भोजन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। हमारे देश में अन्न को ‘अन्नदाता’ और ‘अन्नपूर्णा’ का आशीर्वाद माना गया है। फिर भी विडंबना है कि जहाँ एक ओर लाखों लोग दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर अन्न की बर्बादी होती है। विशेषकर विवाह, भोज और सामाजिक आयोजनों में जूठन के रूप में जो भोजन फेंक दिया जाता है, वह न केवल नैतिक दृष्टि से अनुचित है, बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी हानिकारक है।
विवाह और पार्टियों में अक्सर आवश्यकता से अधिक भोजन बनाया जाता है। लोग अपनी थाली में जरूरत से ज्यादा परोस लेते हैं और आधा-अधूरा छोड़ देते हैं। यह जूठन सीधे कूड़े में जाती है। इससे अन्न का सीधा नुकसान तो होता ही है, साथ ही उस अन्न को उगाने में लगे जल, श्रम, भूमि और ऊर्जा का भी अपव्यय होता है। एक प्लेट चावल के पीछे किसान की मेहनत, सिंचाई का पानी और परिवहन की लागत जुड़ी होती है। जब हम भोजन फेंकते हैं, तो इन सभी संसाधनों का भी अनादर करते हैं।
पर्यावरण पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है। कूड़े में पड़ा सड़ा-गला भोजन मिथेन जैसी हानिकारक गैसें उत्पन्न करता है, जो वैश्विक तापमान वृद्धि का कारण बनती हैं। इसके अलावा, अधिक कचरा नगरपालिकाओं पर अतिरिक्त बोझ डालता है और स्वच्छता की समस्या पैदा करता है। विवाह समारोहों में बचे भोजन का उचित प्रबंधन न होने पर वह सड़कर प्रदूषण फैलाता है और बीमारियों को जन्म देता है।
आर्थिक दृष्टि से भी भोजन की बर्बादी देश की प्रगति में बाधा है। यदि यही भोजन जरूरतमंदों तक पहुँचाया जाए, तो भूख की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अनेक सामाजिक संस्थाएँ अब बचे हुए भोजन को एकत्र कर गरीबों में बाँटने का कार्य कर रही हैं, परंतु यह तभी संभव है जब आयोजक और नागरिक जागरूक हों।
अतः आवश्यक है कि हम भोजन उतना ही लें जितनी आवश्यकता हो। आयोजनों में संतुलित मात्रा में व्यंजन बनाए जाएँ और बचा हुआ भोजन सुरक्षित रूप से जरूरतमंदों तक पहुँचाने की व्यवस्था की जाए। बच्चों में भी अन्न के प्रति सम्मान की भावना विकसित की जानी चाहिए।
जब हम अन्न की रक्षा करेंगे, तभी सच्चे अर्थों में समृद्धि आएगी। अन्न की कद्र करना केवल आर्थिक समझदारी नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है। आइए संकल्प लें—“अन्न बचाएँ, समृद्धि लाएँ” और अपने देश को भूख और बर्बादी से मुक्त बनाने में अपना योगदान दें।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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