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एक रूहानी रिश्ता — सुनीता तिवारी”सरस” लघुकथा

 

लघुकथा

ऐसी प्यारी दोस्ती थी हमारी।
जहाँ शब्द ही सेतु थे और भाव ही संसार।
धीरे-धीरे सुप्रभात केवल अभिवादन नहीं रहा,
वो एक आश्वासन बन गया
कि हम हैं साथ हैं
सुन रहे हैं।
वो अक्सर कहते,
तुम बस यूँ ही मुस्कुराती रहना।
और मैं सचमुच कोशिश करती,
कि मेरी हर पंक्ति में मुस्कान झलके।
हमने कभी कोई वादा नहीं किया,
ना ही कोई नाम दिया उस रिश्ते को।
पर एक अजीब-सा अपनापन था,
जो बिना कहे सब कह जाता था।
दिन भर की भागदौड़ के बाद,
जब रात ढलती और शुभरात्रि लिखते,
तो लगता जैसे कोई दीपक बुझा नहीं,
बस सुबह फिर जलने के लिए रख दिया गया हो।
कभी-कभी जीवन की उलझनों ने
बातों के सिलसिले को धीमा कर दिया।
संदेश कम हुए, शब्द छोटे हुए,
पर एहसास
वो कभी कम नहीं हुआ।
एक दिन यूँ ही मैंने पूछा,
अगर हम कभी बात न कर पाएँ तो?
उन्होंने हँसकर लिखा,
रूहानी रिश्ते दूरी से नहीं टूटते।
आज भी कभी सुबह की किरण
जब खिड़की से अंदर आती है,
मैं अनायास मुस्कुरा देती हूँ
जैसे कोई अब भी कह रहा हो,
मुस्कुराती रहिए
शायद यही रूहानी रिश्ता है
जो पास होकर भी बंधन नहीं,
और दूर होकर भी दूरी नहीं।

सुनीता तिवारी”सरस”
स्वरचित

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