सुरक्षा के लिए शिक्षा: सुरक्षित भारत के निर्माण में राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, गृह मंत्रालय की भूमिका – डॉ हितेश गोयल

सुरक्षा का सबसे प्रभावी हथियार शस्त्र नहीं, शिक्षित और जागरूक नागरिक है
आलोक अवस्थी। नजर इंडिया 24, ब्यूरो चीफ
इक्कीसवीं सदी में सुरक्षा (Security) की अवधारणा केवल सीमाओं की रक्षा या कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गई है। आज साइबर अपराध, वित्तीय धोखाधड़ी, आतंकवाद, संगठित अपराध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित अपराध, डेटा सुरक्षा, महिला एवं बाल सुरक्षा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनेक नए आयाम सामने आए हैं। ऐसे परिवेश में सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी माध्यम केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि नागरिकों, पुलिस, सुरक्षा बलों, प्रशासन, उद्योग और समाज को शिक्षित एवं प्रशिक्षित करना है। इसी विचार को सुरक्षा के लिए शिक्षा की अवधारणा सशक्त रूप से प्रस्तुत करती है। यदि प्रत्येक नागरिक सुरक्षा संबंधी मूलभूत ज्ञान से सुसज्जित हो, तो वह न केवल स्वयं सुरक्षित रहेगा बल्कि समाज और राष्ट्र की सुरक्षा में भी सक्रिय भागीदार बनेगा। शिक्षा और सुरक्षा का परस्पर संबंध व्यक्ति को केवल रोजगार योग्य नहीं बनाती, बल्कि उसे उत्तरदायी नागरिक भी बनाती है। एक शिक्षित नागरिक साइबर अपराधों की पहचान कर सकता है, डिजिटल माध्यमों का सुरक्षित उपयोग करता है, फर्जी समाचार एवं दुष्प्रचार से बच सकता है, संवैधानिक कर्तव्यों और नागरिक उत्तरदायित्वों को समझता है, आपदा एवं आपातकालीन परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने में सक्षम होता है, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति जागरूक एवं संवेदनशील रहता है, इसी कारण आज सुरक्षा शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का अभिन्न अंग माना जा रहा है। सुरक्षा शिक्षा का राष्ट्रीय केंद्र भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन स्थापित राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय को वर्ष 2020 में संसद द्वारा पारित अधिनियम के माध्यम से “राष्ट्रीय महत्व का संस्थान” घोषित किया गया। इसका उद्देश्य सुरक्षा, पुलिसिंग, आंतरिक सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, अपराध विज्ञान, फोरेंसिक विज्ञान, रणनीतिक अध्ययन तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित उच्च शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रशिक्षण को बढ़ावा देना है। विश्वविद्यालय की विशेषता यह है कि यह पारंपरिक विश्वविद्यालयों से अलग सुरक्षा-केंद्रित शिक्षा प्रदान करता है। यहाँ केवल विद्यार्थियों को ही नहीं, बल्कि पुलिस अधिकारियों, अर्धसैनिक बलों, प्रशासनिक अधिकारियों, उद्योगों तथा विभिन्न संस्थाओं के कर्मियों को भी आधुनिक सुरक्षा विषयों पर प्रशिक्षित किया जाता है। विश्वविद्यालय का लक्ष्य सुरक्षा क्षेत्र के लिए ऐसे मानव संसाधन तैयार करना है जो तकनीकी दक्षता, नैतिक मूल्यों और व्यावहारिक कौशल से परिपूर्ण हों। डिजिटल इंडिया अभियान के साथ-साथ ऑनलाइन बैंकिंग, यूपीआई, ई-कॉमर्स और डिजिटल भुगतान में तीव्र वृद्धि हुई है। इसके साथ साइबर अपराध भी तेजी से बढ़े हैं। फ़िशिंग, ओटीपी धोखाधड़ी, निवेश घोटाले, डिजिटल अरेस्ट, सोशल मीडिया प्रतिरूपण और क्यूआर कोड आधारित ठगी जैसी घटनाएँ आम नागरिकों के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। ऐसी परिस्थितियों में तकनीकी सुरक्षा के साथ-साथ नागरिक जागरूकता सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच सिद्ध होती है। 1930 हेल्पलाइन और ‘गोल्डन ऑवर’ भारत सरकार ने वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की त्वरित रिपोर्टिंग के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन प्रारंभ की है। यदि किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी होती है, तो उसे बिना विलंब 1930 पर कॉल करना चाहिए तथा राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। इस त्वरित कार्रवाई का उद्देश्य संदिग्ध लेन-देन को समय रहते रोकना और धन की रिकवरी की संभावना बढ़ाना है। इसी संदर्भ में गोल्डन ऑवर अत्यंत महत्वपूर्ण है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अनुसार, धोखाधड़ी का पता चलते ही पहले लगभग एक घंटे के भीतर शिकायत दर्ज कराना सबसे प्रभावी माना जाता है। इस अवधि में बैंकिंग चैनलों और जांच एजेंसियों द्वारा धन को फ्रीज़ करने की संभावना अधिक रहती है, जिससे पीड़ित की राशि बचाई जा सकती है। इसलिए प्रत्येक नागरिक को यह जानकारी होना आवश्यक है कि साइबर धोखाधड़ी होने पर घबराने के बजाय तुरंत 1930 पर संपर्क करना चाहिए। सुरक्षा शिक्षा का सामाजिक प्रभाव: यदि विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और प्रशिक्षण संस्थानों में सुरक्षा शिक्षा को नियमित पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए, तो इसके अनेक सकारात्मक परिणाम सामने आएँगे| साइबर अपराधों में कमी आएगी। डिजिटल भुगतान अधिक सुरक्षित होंगे। फर्जी समाचारों एवं अफवाहों पर नियंत्रण होगा। महिला एवं बाल सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी। नागरिकों और पुलिस के बीच विश्वास मजबूत होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति जनभागीदारी बढ़ेगी। आपदा एवं संकट प्रबंधन की क्षमता विकसित होगी।
राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय आने वाले समय में भारत के “सुरक्षा ज्ञान केंद्र” के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विश्वविद्यालय निम्न क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा सकता है, प्रत्येक जिले में साइबर जागरूकता अभियान, विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के लिए सुरक्षा साक्षरता पाठ्यक्रम, उद्योगों एवं स्टार्टअप्स के लिए साइबर सुरक्षा प्रमाणन कार्यक्रम, पंचायत एवं नगरीय निकायों के लिए सामुदायिक सुरक्षा प्रशिक्षण, महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों एवं युवाओं के लिए डिजिटल सुरक्षा अभियान, पुलिस, अभियोजन एवं न्यायिक अधिकारियों के लिए सतत क्षमता निर्माण कार्यक्रम, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन सुरक्षा, डिजिटल फोरेंसिक और आर्थिक अपराधों पर विशेष अनुसंधान।
आज भारत “सुरक्षित और विकसित राष्ट्र” बनने की दिशा में अग्रसर है। इस लक्ष्य की प्राप्ति केवल सुरक्षा बलों या कानूनों के माध्यम से संभव नहीं है। इसके लिए प्रत्येक नागरिक का शिक्षित, जागरूक और उत्तरदायी होना आवश्यक है। “सुरक्षा के लिए शिक्षा” इसी राष्ट्रीय दृष्टि का आधार है। गृह मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय जैसे संस्थान की स्थापना यह दर्शाती है कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों का समाधान केवल हथियारों से नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान, प्रशिक्षण और जन-जागरूकता से संभव है। 1930 राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन, गोल्डन ऑवर में शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था तथा व्यापक साइबर जागरूकता अभियान इस बात के उदाहरण हैं कि समय पर दी गई सही शिक्षा नागरिकों की संपत्ति, सम्मान और जीवन—तीनों की रक्षा कर सकती है। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि “सुरक्षा का भविष्य शिक्षा में है, और शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि सुरक्षित समाज और सक्षम राष्ट्र का निर्माण करना है।डॉ हितेश गोयल, सहायक प्राध्यापक, पुलिस प्रशासन, ट्रांजिट कैंपस राष्ट्रीय रक्षा विश्विद्यालय, उत्तर प्रदेश




